मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर लगाई 10 लाख रुपये की कॉस्ट
नई दिल्ली: संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत एहतियाती हिरासत का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने हिरासत आदेश को अवैध ठहराते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट भी लगाई है।
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। मुल्ला अफरोज ने अपनी NSA हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए हिरासत के आदेश को बरकरार रखा था।
पुलिस हिरासत के कथित कबूलनामे पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी किया जा सकता है। 8 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान भी पीठ ने इसी पहलू पर यूपी सरकार से सवाल किए थे और मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अदालत ने कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए यह भी पूछा था कि जब घटना से संबंधित CCTV फुटेज उपलब्ध था, तो मुल्ला अफरोज को घटना के 54 दिन बाद आरोपी क्यों बनाया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्रिवेंटिव डिटेंशन किसी व्यक्ति को सजा देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित गतिविधियों को रोकने के लिए होती है।
2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है मामला
मुल्ला अफरोज को नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के बाद हुई हिंसा के मामले में आरोपी बनाया गया था। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए दावा किया था कि उन्हें बाद में पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर मामले से जोड़ा गया।
अफरोज को 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत में लिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिरासत का बचाव करते हुए कहा था कि हिंसा के बाद इलाके में कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति प्रभावित हुई थी और उपलब्ध सामग्री के आधार पर भविष्य में ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन जरूरी थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था हिरासत आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में मुल्ला अफरोज की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि हिरासत का आदेश संबंधित अधिकारी की ‘सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन’ और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिया गया था। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर को मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे और उसके आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन की वैधता पर विशेष रूप से सवाल उठाए थे।
यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट
अब सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। अदालत के मुताबिक, पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को इस तरह की एहतियाती हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
इस फैसले से संभल हिंसा मामले में NSA के तहत की गई कार्रवाई को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश सामने आया है। हालांकि, यह आदेश मुल्ला अफरोज के खिलाफ दर्ज मूल आपराधिक मामले के सभी पहलुओं का स्वतः निपटारा नहीं करता; सुप्रीम कोर्ट का फैसला विशेष रूप से उनकी प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़ा है।