दीप्ति जीवनजी ने एशियाई पैरा खेलों में फिर जीता गोल्ड, मजदूर माता-पिता की बेटी ने बढ़ाया भारत का मान
नई दिल्ली, 20 अक्टूबर 2026। भारत की पैरा एथलीट दीप्ति जीवनजी ने जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई पैरा खेलों में महिलाओं की 400 मीटर टी20 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया है। 23 वर्षीय दीप्ति ने शानदार प्रदर्शन करते हुए लगातार दूसरी बार इस प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया। सीमित आर्थिक संसाधनों और कई चुनौतियों के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली दीप्ति की कहानी मेहनत, हौसले और परिवार के सहयोग की मिसाल है।
400 मीटर टी20 स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन
दीप्ति ने महिलाओं की 400 मीटर टी20 दौड़ में दमदार प्रदर्शन करते हुए पहला स्थान हासिल किया। उनकी इस उपलब्धि ने एक बार फिर भारतीय पैरा एथलेटिक्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। टी20 श्रेणी बौद्धिक दिव्यांगता वाले खिलाड़ियों के लिए निर्धारित होती है।
इस जीत के साथ दीप्ति ने पिछली एशियाई पैरा खेल प्रतियोगिता में मिली सफलता को दोहराया। लगातार दूसरी बार स्वर्ण पदक जीतना उनके निरंतर अभ्यास और खेल के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
तेलंगाना से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय सफर
दीप्ति जीवनजी तेलंगाना की रहने वाली हैं। बचपन से ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी दौड़ने की प्रतिभा ने उन्हें खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का अवसर दिया। प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन और नियमित अभ्यास के जरिए उन्होंने अपने प्रदर्शन में सुधार किया।
वर्ष 2019 में हांगकांग में आयोजित एशियाई यूथ चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतना उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का अहम पड़ाव रहा। इस उपलब्धि के बाद उन्होंने लगातार मेहनत की और बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए अपनी पहचान मजबूत की।
विश्व चैंपियनशिप और पैरालंपिक में भी हासिल की उपलब्धियां
दीप्ति ने 2023 के एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद 2024 में पैरा एथलेटिक्स विश्व चैंपियनशिप में महिलाओं की 400 मीटर टी20 स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल कर विश्व रिकॉर्ड प्रदर्शन किया।
पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी उन्होंने कांस्य पदक जीता। इन उपलब्धियों ने उन्हें भारत की प्रमुख पैरा एथलीटों में शामिल कर दिया। अब एशियाई पैरा खेलों में एक बार फिर स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपने करियर में एक और उल्लेखनीय उपलब्धि जोड़ ली है।
दिहाड़ी मजदूरी करने वाले माता-पिता ने दिया साथ
दीप्ति की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का संघर्ष और सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा है। उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण करते रहे। आर्थिक सीमाओं के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को आगे बढ़ने और खेल में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
दीप्ति की कहानी बताती है कि किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे उसका व्यक्तिगत प्रयास ही नहीं, बल्कि परिवार का समर्थन और सही अवसर भी महत्वपूर्ण होते हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखना उनके सफर का अहम हिस्सा रहा है।
पैरा खेलों में भारत के लिए प्रेरणा
दीप्ति जीवनजी का स्वर्ण पदक भारतीय खेल जगत के लिए गर्व का क्षण है। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि उचित प्रशिक्षण, सुविधाएं और अवसर मिलने पर दिव्यांग खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं।
लगातार दूसरी बार एशियाई पैरा खेलों में गोल्ड जीतकर दीप्ति ने अपनी मेहनत और प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी यात्रा देश के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।