भारत में मदरसों के रजिस्ट्रेशन और मान्यता को लेकर नियम एक जैसे नहीं हैं। मदरसा शिक्षा और उससे जुड़े संस्थानों का नियमन मुख्य रूप से संबंधित राज्य सरकारों के कानूनों और नियमों के तहत होता है। शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है, इसलिए राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
मदरसा चलाने के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी
किसी मदरसे को संस्थागत और कानूनी रूप देने के लिए आम तौर पर उसे संबंधित कानून के तहत पंजीकृत संस्था के रूप में स्थापित करना होता है। इसके लिए सोसाइटी, ट्रस्ट या अन्य वैधानिक संस्था के रूप में पंजीकरण का रास्ता अपनाया जा सकता है। इसके बाद संबंधित राज्य के नियमों के अनुसार मदरसा बोर्ड या सक्षम प्राधिकरण से मान्यता लेने की प्रक्रिया होती है।
हालांकि, सिर्फ संस्था के रूप में रजिस्ट्रेशन होना और शैक्षणिक मान्यता मिलना एक ही बात नहीं है। मान्यता के लिए भवन, शिक्षक, पाठ्यक्रम, विद्यार्थियों की संख्या और अन्य निर्धारित मानकों को पूरा करना पड़ सकता है।
हर राज्य में अलग हो सकते हैं नियम
मदरसा शिक्षा के नियम राज्य-दर-राज्य अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में मदरसों की मान्यता और नियमन के लिए उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड की व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा अधिनियम, 2004 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी, हालांकि 12वीं के बाद कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा डिग्री से जुड़े प्रावधानों को UGC कानून के अनुरूप नहीं माना गया।
बिना मान्यता वाले मदरसे का क्या?
किसी संस्था का धार्मिक या निजी तौर पर संचालित होना अपने आप में उसे सरकारी शैक्षणिक मान्यता नहीं देता। यदि कोई मदरसा राज्य के मान्यता प्राप्त शिक्षा तंत्र के तहत प्रमाणपत्र, बोर्ड परीक्षा या सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना चाहता है तो उसे संबंधित नियमों और मान्यता की शर्तों को पूरा करना पड़ सकता है।
केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि शिक्षा से जुड़े कई प्रशासनिक और शिक्षक सेवा संबंधी विषय संबंधित राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
उत्तराखंड में बदली व्यवस्था
2026 में उत्तराखंड ने मदरसा शिक्षा के नियमन की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया। राज्य ने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USAME) की व्यवस्था लागू की। इसके तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए नए मान्यता नियम लागू किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा?
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मामले में कहा कि राज्य मदरसों में शिक्षा के मानक तय कर सकता है। साथ ही, उच्च शिक्षा और डिग्री प्रदान करने से जुड़े मामलों में UGC कानून का पालन जरूरी है। यानी मदरसा चलाने, राज्य स्तर पर मान्यता पाने और विश्वविद्यालय स्तर की डिग्री देने—इन तीनों को अलग-अलग कानूनी पहलुओं के रूप में देखा जाता है।
इसलिए भारत में किसी मदरसे की वैध स्थिति जानने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह किस राज्य में स्थित है, किस कानून या संस्था के तहत पंजीकृत है और उसे संबंधित राज्य के सक्षम प्राधिकरण से किस स्तर की मान्यता प्राप्त है।