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Thara Fufa Zinda Hai Dulichand: ‘थारा फूफा जिंदा है’ से मशहूर दुलीचंद का 106 साल की उम्र में निधन

By aonenewstv | Published: Oct 26, 2026 12:50 PM

‘थारा फूफा जिंदा है’ कहकर सिस्टम को चुनौती देने वाले दुलीचंद का निधन, 106 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

हरियाणा के रोहतक में सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित किए जाने के खिलाफ अनोखा विरोध प्रदर्शन कर देशभर में चर्चित हुए दुलीचंद का निधन हो गया। ‘मैं जिंदा हूं’ और ‘थारा फूफा जिंदा है’ लिखी तख्तियों के साथ सरकारी व्यवस्था की खामियों को उजागर करने वाले दुलीचंद ने 106 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली।

रोहतक, 26 अक्टूबर 2026। हरियाणा के रोहतक जिले के गांधरा गांव निवासी दुलीचंद अब इस दुनिया में नहीं रहे। ‘थारा फूफा जिंदा है’ के नारे से पूरे प्रदेश में पहचान बनाने वाले दुलीचंद का 106 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने शनिवार शाम अपने आवास पर अंतिम सांस ली। रविवार को उनके पैतृक गांव गांधरा में अंतिम संस्कार किया गया।

दुलीचंद का नाम उस समय सुर्खियों में आया था, जब सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत दिखाए जाने के कारण उनकी वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई थी। अपनी जीवित होने की पहचान साबित करने के लिए उन्होंने ऐसा अनोखा तरीका अपनाया, जिसने सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

उनका ‘थारा फूफा जिंदा है’ वाला नारा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। इसके बाद वह हरियाणा में सरकारी रिकॉर्ड की गड़बड़ियों और बुजुर्गों की समस्याओं के खिलाफ संघर्ष का चर्चित चेहरा बन गए थे।

सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित होने से शुरू हुआ संघर्ष

दुलीचंद के जीवन में एक समय ऐसा आया, जब सरकारी दस्तावेजों में उन्हें मृत दिखा दिया गया। इसके चलते उनकी वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई।

दुलीचंद जीवित थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनकी स्थिति कुछ और ही दर्ज थी। इस गलती को ठीक कराने और पेंशन दोबारा शुरू करवाने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा।

इस घटना ने सरकारी रिकॉर्ड के सत्यापन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े किए। विशेष रूप से उन बुजुर्गों की परेशानियां सामने आईं, जो अपनी पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाओं के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर रहते हैं।

‘मैं जिंदा हूं’ की तख्ती लेकर किया था अनोखा प्रदर्शन

सरकारी रिकॉर्ड में खुद को जीवित साबित करने के लिए दुलीचंद ने अनोखा विरोध प्रदर्शन किया था।

उन्होंने अपने हाथों में दो तख्तियां पकड़ी थीं। एक पर लिखा था ‘मैं जिंदा हूं’, जबकि दूसरी पर हरियाणवी अंदाज में लिखा था ‘थारा फूफा जिंदा है’।

उनके विरोध प्रदर्शन का यह तरीका लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। दुलीचंद ने अपने प्रदर्शन के जरिए सरकारी रिकॉर्ड में हुई गलती की ओर प्रशासन और आम जनता का ध्यान आकर्षित किया।

उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। देखते ही देखते दुलीचंद का नाम हरियाणा के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में भी चर्चित हो गया।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था ‘थारा फूफा जिंदा है’ नारा

दुलीचंद का नारा केवल एक विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। यह सरकारी व्यवस्था में होने वाली गलतियों पर सवाल उठाने का प्रतीक बन गया।

हरियाणवी भाषा में कही गई उनकी बात लोगों को अलग अंदाज में अपनी परेशानी बताने का उदाहरण लगी।

सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने उनकी समस्या पर प्रतिक्रिया दी। कई लोगों ने सरकारी दस्तावेजों में होने वाली गलतियों और उन्हें ठीक कराने की जटिल प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

इस घटना ने यह भी दिखाया कि कभी-कभी प्रशासनिक गलती किसी व्यक्ति के जीवन पर कितना गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

वृद्धावस्था पेंशन बंद होने से बढ़ी थीं परेशानियां

हरियाणा में बुजुर्गों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए वृद्धावस्था सम्मान भत्ता योजना संचालित की जाती है।

इस योजना के तहत पात्र बुजुर्गों को निर्धारित राशि मासिक पेंशन के रूप में उपलब्ध कराई जाती है।

दुलीचंद का मामला सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा था कि सरकारी रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति को गलती से मृत दर्ज कर दिए जाने पर उसकी पेंशन और अन्य सुविधाएं किस प्रकार प्रभावित हो सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी समस्याओं से बचने के लिए सरकारी रिकॉर्ड का नियमित सत्यापन और शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण आवश्यक है।

दुलीचंद के जीवन पर बनी थी हरियाणवी फिल्म

दुलीचंद का संघर्ष इतना चर्चित हुआ कि उनके जीवन और ‘थारा फूफा जिंदा है’ नारे से प्रेरित होकर एक हरियाणवी फिल्म भी बनाई गई थी।

इस फिल्म को लेकर विवाद भी सामने आया था। हालांकि, दुलीचंद की कहानी ने सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना दिया।

उनके जीवन की इस घटना ने यह संदेश दिया कि आम नागरिक भी अपनी समस्या को अनोखे तरीके से उठाकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित कर सकता है।

106 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

रोहतक के गांधरा गांव में रहने वाले दुलीचंद ने 106 वर्ष की लंबी उम्र पूरी की।

शनिवार शाम उनके निधन के बाद परिवार और गांव में शोक का माहौल बन गया। रविवार को गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

दुलीचंद अपने पीछे ऐसी कहानी छोड़ गए हैं, जो सरकारी रिकॉर्ड में एक छोटी-सी गलती से शुरू होकर व्यापक चर्चा का विषय बन गई।

उनकी पहचान केवल लंबी उम्र या वायरल नारे तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह उस व्यक्ति के रूप में याद किए जाएंगे, जिसने सरकारी कागजों में मृत घोषित होने के बावजूद अपनी जीवित पहचान साबित करने के लिए आवाज उठाई।

सरकारी व्यवस्था के लिए सवाल छोड़ गया दुलीचंद का संघर्ष

दुलीचंद के निधन के साथ ही हरियाणा के एक चर्चित बुजुर्ग की जीवन यात्रा समाप्त हो गई, लेकिन उनका संघर्ष प्रशासनिक व्यवस्था के लिए कई महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया।

सरकारी दस्तावेजों में दर्ज गलतियां कई बार आम नागरिकों को पेंशन, राशन, स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य सरकारी योजनाओं से वंचित कर सकती हैं।

विशेष रूप से बुजुर्गों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए इन गलतियों को ठीक कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

दुलीचंद के मामले ने ऐसी प्रशासनिक समस्याओं को सार्वजनिक चर्चा में लाने का काम किया था।

उनका ‘थारा फूफा जिंदा है’ नारा आज भी सरकारी रिकॉर्ड की गलतियों के खिलाफ उठाई गई एक यादगार आवाज के रूप में जाना जाता है।

एक नारा जो बन गया पहचान

दुलीचंद का जीवन इस बात का उदाहरण बन गया कि अपनी समस्या को लेकर उठाई गई आवाज कभी-कभी पूरे समाज का ध्यान आकर्षित कर सकती है।

जिस व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया था, उसने अपने जीवित होने का प्रमाण देने के लिए अनोखा विरोध प्रदर्शन किया और देशभर में चर्चा का विषय बन गया।

आज दुलीचंद भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका चर्चित नारा ‘थारा फूफा जिंदा है’ और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ उनका संघर्ष लंबे समय तक लोगों की यादों में बना रहेगा।

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