जंतर-मंतर पर कथित जातिसूचक टिप्पणी का मामला, दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला पत्रकार को नहीं दी अंतरिम राहत
नई दिल्ली, 27 अक्टूबर 2026। दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर के पास एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधिकारी के खिलाफ कथित जातिसूचक टिप्पणी करने के मामले में आरोपी महिला पत्रकार को फिलहाल राहत देने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच पर अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया। हालांकि, अदालत ने उनकी याचिका पर दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) विवेक भगत को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस मिनी पुष्कर्णा की अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस का पक्ष सुने बिना जांच रोकने का आदेश देना उचित नहीं होगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित की है।
इस मामले में महिला पत्रकार ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की है। उनके वकील का दावा है कि पुलिस अधिकारी की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत दुर्भावनापूर्ण है और इसका उद्देश्य महिला पत्रकार को उनके द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को आगे बढ़ाने से रोकना है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने जांच रोकने से क्यों किया इनकार?
मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान महिला पत्रकार की ओर से अदालत में अंतरिम राहत की मांग की गई। उनके वकील ने कहा कि शिकायत के पीछे बदले की भावना है और जांच जारी रहने से याचिकाकर्ता को नुकसान हो सकता है।
अदालत ने इस चरण पर जांच रोकने से इनकार करते हुए कहा कि पहले दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत की मांग को अंतिम रूप से खारिज नहीं किया गया है। पुलिस का जवाब मिलने के बाद मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
इस आदेश का अर्थ यह है कि फिलहाल महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज मामले की जांच जारी रह सकती है। हालांकि, अदालत ने अभी आरोपों की सत्यता या महिला पत्रकार की दोषसिद्धि पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
ACP विवेक भगत की शिकायत पर दर्ज हुई थी FIR
मामले की शुरुआत 3 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर के पास बूटा सिंह चौराहे पर आयोजित एक प्रदर्शन से जुड़ी है।
दिल्ली पुलिस के नई दिल्ली जिले के कनॉट प्लेस उपमंडल में तैनात एसीपी विवेक भगत उस दिन कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर मौजूद थे।
उनकी शिकायत के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकार ने कथित तौर पर उनकी मेघ/मेघवाल जाति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि महिला पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से उनकी जातिगत पहचान को लेकर टिप्पणी की और एसीपी पद पर उनकी नियुक्ति पर भी सवाल उठाए।
एसीपी विवेक भगत ने इसे जातिगत अपमान बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
दिल्ली पुलिस ने उनकी शिकायत के आधार पर महिला पत्रकार और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
SC/ST एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में मामला दर्ज
पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं भी लगाई गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 221, 356(2) और 3(5) का उल्लेख किया गया है।
इन धाराओं का संबंध क्रमशः लोक सेवक के सार्वजनिक कार्य में बाधा, मानहानि और साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधानों से है।
पुलिस की शिकायत में सार्वजनिक रूप से जातिसूचक टिप्पणी करने, अपमानित करने और सरकारी कामकाज में बाधा डालने जैसे आरोप शामिल हैं।
हालांकि, इन आरोपों की सत्यता जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निर्धारित होगी।
महिला पत्रकार के वकील ने FIR को बताया बदले की कार्रवाई
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान महिला पत्रकार के वकील ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने दावा किया कि एसीपी विवेक भगत की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर वास्तव में महिला पत्रकार को डराने और उनके द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को आगे बढ़ाने से रोकने का प्रयास है।
वकील ने अदालत को बताया कि महिला पत्रकार ने भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया था।
उनका तर्क था कि महिला पत्रकार की शिकायत पर कार्रवाई में देरी हुई, जबकि एसीपी की शिकायत पर तत्काल मामला दर्ज कर लिया गया।
बचाव पक्ष ने इस अंतर को पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का आधार बताया।
3 अक्टूबर को शिकायत, 13 अक्टूबर को FIR दर्ज होने का दावा
महिला पत्रकार के वकील ने अदालत में शिकायत दर्ज करने की समयसीमा का मुद्दा भी उठाया।
उन्होंने कहा कि महिला पत्रकार 3 अक्टूबर को पुलिस स्टेशन पहुंची थीं और एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की थी।
वकील के अनुसार, उनकी शिकायत पर 13 अक्टूबर को मामला दर्ज किया गया।
दूसरी ओर, एसीपी विवेक भगत ने 13 अक्टूबर को अपनी शिकायत दी और कुछ ही मिनटों के भीतर एफआईआर दर्ज कर ली गई।
महिला पत्रकार के वकील ने आरोप लगाया कि यह अंतर पुलिस कार्रवाई में पक्षपात की आशंका पैदा करता है।
हालांकि, इस दावे पर दिल्ली पुलिस का विस्तृत जवाब अदालत में आना बाकी है।
महिला पत्रकार के अनुसूचित जनजाति समुदाय से होने का भी दिया हवाला
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने महिला पत्रकार की सामाजिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया।
वकील ने अदालत को बताया कि महिला पत्रकार स्वयं नागालैंड के अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में महिला पत्रकार को एसीपी विवेक भगत की जातिगत पहचान की जानकारी कैसे हो सकती थी।
बचाव पक्ष ने इस तर्क के आधार पर जातिसूचक टिप्पणी के आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
हालांकि, किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान अपने आप में आरोपों को सही या गलत साबित नहीं करती। इस मामले में कथित टिप्पणी, उसके संदर्भ और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया के तहत किया जाएगा।
यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर भी विवाद
इस मामले में महिला पत्रकार की ओर से एसीपी विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने की बात भी सामने आई है।
वहीं, एसीपी की शिकायत में कहा गया है कि 3 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने और हिरासत में लेने की कार्रवाई के दौरान महिला पत्रकार ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
एसीपी ने अपनी शिकायत में दावा किया कि महिला पत्रकार और उनके साथ मौजूद लोगों ने बार-बार उनका सामना किया, जिससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उनके काम में बाधा उत्पन्न हुई।
यह भी आरोप लगाया गया कि महिला पत्रकार और कॉकरेच जनता पार्टी से जुड़े कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो रील साझा कर उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए।
इन आरोपों को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। फिलहाल किसी भी पक्ष के आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो भी विवाद का हिस्सा
एसीपी विवेक भगत की शिकायत में सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री का भी उल्लेख किया गया है।
शिकायत के अनुसार, महिला पत्रकार और कुछ अन्य लोगों ने कथित तौर पर ऐसी पोस्ट और वीडियो साझा किए, जिनमें पुलिस अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाए गए थे।
पुलिस अधिकारी ने इन गतिविधियों को अपनी प्रतिष्ठा और सरकारी कामकाज को प्रभावित करने वाला बताया है।
इस प्रकार मामले में प्रदर्शन स्थल पर हुई कथित घटना के साथ सोशल मीडिया पर साझा की गई सामग्री भी विवाद का हिस्सा बन गई है।
जांच के दौरान संबंधित सामग्री, शिकायतों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और ACP को जारी किया नोटिस
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता एसीपी विवेक भगत को नोटिस जारी किया है।
अदालत ने दोनों पक्षों से 16 नवंबर 2026 तक जवाब दाखिल करने को कहा है।
इस दौरान पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज मामले का आधार क्या है और जांच की वर्तमान स्थिति क्या है।
इसके बाद अदालत याचिका में उठाए गए मुद्दों पर आगे सुनवाई करेगी।
महिला पत्रकार की ओर से एफआईआर रद्द करने और अंतरिम राहत देने की मांग की गई है, जबकि अदालत ने फिलहाल जांच पर रोक नहीं लगाई है।
16 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
अगली सुनवाई में दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता एसीपी विवेक भगत का जवाब महत्वपूर्ण रहेगा।
अदालत दोनों पक्षों की दलीलों, एफआईआर में दर्ज आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय करेगी।
महिला पत्रकार के वकील की ओर से लगाए गए दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई और पक्षपात के आरोपों पर भी सुनवाई के दौरान विचार हो सकता है।
मामले में आगे क्या होगा?
इस मामले में फिलहाल तीन प्रमुख मुद्दे सामने हैं। पहला, एसीपी विवेक भगत की शिकायत पर दर्ज एफआईआर की कानूनी वैधता। दूसरा, महिला पत्रकार की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के आरोप। तीसरा, पुलिस की जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए गए सवाल।
हाईकोर्ट ने अभी किसी भी पक्ष के आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
अदालत का वर्तमान आदेश केवल इतना है कि पुलिस का जवाब आने तक जांच रोकने का आधार नहीं बनता।
फिलहाल महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच जारी रहेगी और 16 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में मामले की आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
यह मामला पुलिस अधिकारी और पत्रकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ निष्पक्ष जांच, शिकायतों पर कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के कारण चर्चा में है।