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प्रोफेसर योगेश सिंह बने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति, लगातार दूसरा कार्यकाल

By aonenewstv | Published: Oct 12, 2026 09:06 AM

DU के कुलपति योगेश सिंह को लगातार दूसरा कार्यकाल, 77 साल में पहली बार भारतीय कुलपति को मिला मौका

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने लगातार दूसरे पांच वर्षीय कार्यकाल की जिम्मेदारी संभाल ली है। 8 अक्टूबर 2026 से उनका दूसरा कार्यकाल शुरू हो गया। इस नियुक्ति के साथ वह आजादी के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पाने वाले पहले भारतीय कुलपति बन गए हैं। यदि वह अपना पूरा कार्यकाल पूरा करते हैं, तो अक्टूबर 2031 तक इस पद पर बने रहेंगे।

2023 में बदला गया था 77 साल पुराना नियम

प्रोफेसर योगेश सिंह की दोबारा नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय के नियमों में पहले मौजूदा कुलपति को लगातार दूसरा कार्यकाल देने का प्रावधान नहीं था।

अक्टूबर 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय के स्टैच्यूट 11-F(4) में संशोधन किया गया। इसके बाद कुलपति को पांच साल के कार्यकाल के बाद एक और पांच वर्षीय कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त करने का रास्ता खुल गया। योगेश सिंह की पुनर्नियुक्ति इस संशोधित नियम के तहत पहला मामला है।

राष्ट्रपति की मंजूरी से हुई नियुक्ति

शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने 2 जुलाई 2026 को जारी पत्र के माध्यम से विश्वविद्यालय को पुनर्नियुक्ति की जानकारी दी थी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली विश्वविद्यालय की विजिटर के रूप में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए प्रोफेसर योगेश सिंह को दूसरे पांच वर्षीय कार्यकाल के लिए मंजूरी दी।

योगेश सिंह ने 8 अक्टूबर 2021 को दिल्ली विश्वविद्यालय के 23वें कुलपति के रूप में पदभार संभाला था। उनका पहला कार्यकाल 7 अक्टूबर 2026 को समाप्त हुआ। इसके अगले दिन से उनका दूसरा कार्यकाल प्रभावी हो गया।

कौन हैं प्रोफेसर योगेश सिंह?

प्रोफेसर योगेश सिंह उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बनने से पहले वह दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) के कुलपति और नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के निदेशक रह चुके हैं। उन्होंने महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा के कुलपति के रूप में भी काम किया है।

उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि कंप्यूटर इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग से जुड़ी है। विश्वविद्यालय प्रशासन में उनके अनुभव के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके दूसरे कार्यकाल को शिक्षा नीति और प्रशासनिक निरंतरता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पहले कार्यकाल में लागू हुए कई बड़े शैक्षणिक बदलाव

प्रोफेसर योगेश सिंह के पहले कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप कई बदलाव किए। इनमें चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUP), अंडरग्रेजुएट करिकुलम फ्रेमवर्क 2022 और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) के माध्यम से दाखिला व्यवस्था प्रमुख हैं।

चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के तहत विद्यार्थियों को बहुविषयक शिक्षा और पाठ्यक्रम में अधिक विकल्प देने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही क्रेडिट आधारित शिक्षा प्रणाली और पढ़ाई के विभिन्न चरणों में प्रवेश तथा निकास के विकल्पों को भी महत्व दिया गया।

CUET के माध्यम से दाखिले की व्यवस्था ने दिल्ली विश्वविद्यालय की स्नातक प्रवेश प्रक्रिया को साझा राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा से जोड़ दिया। इन बदलावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बनाना है।

AICTE के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं

प्रोफेसर योगेश सिंह अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के चेयरमैन भी हैं। उन्होंने दिसंबर 2025 में यह जिम्मेदारी संभाली थी। AICTE देश में तकनीकी शिक्षा से संबंधित संस्थानों और पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता तथा नियमन से जुड़े कार्य करता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय और AICTE दोनों की जिम्मेदारियों के बीच उन्हें उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा से जुड़े विभिन्न विषयों पर काम करना होगा।

दूसरे कार्यकाल में इन मुद्दों पर रहेंगी नजरें

प्रोफेसर योगेश सिंह के दूसरे कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन, चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम, शोध की गुणवत्ता, शिक्षकों की नियुक्ति और विद्यार्थियों को उपलब्ध सुविधाओं जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे।

विश्वविद्यालय के सामने यह चुनौती भी होगी कि नए पाठ्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलें। इसके साथ ही कॉलेजों और विभागों में बुनियादी सुविधाओं तथा प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना भी अहम रहेगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में प्रोफेसर योगेश सिंह की पुनर्नियुक्ति एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। अब उनके दूसरे कार्यकाल में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नीतियों और प्रशासनिक सुधारों को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाता है, इस पर विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा जगत की नजरें रहेंगी।

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