दिल्ली हाई कोर्ट: ने संसद की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संसद की सुरक्षा का प्रबंधन सरकार का विषय है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका की मंशा और उसके दायरे पर भी सवाल उठाए तथा टिप्पणी की कि हर मामले में न्यायपालिका से निर्देश की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि संसद अपनी सुरक्षा व्यवस्था किस प्रकार संचालित करे। अदालत ने यह भी कहा कि सुरक्षा संबंधी नीतिगत निर्णय कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
याचिका पर अदालत ने उठाए कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि आखिर इस प्रकार की याचिका का उद्देश्य क्या है और क्या अदालत संसद की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कराने का आदेश दे सकती है?
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आजकल बड़ी संख्या में जनहित याचिकाएं दायर की जा रही हैं और कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि उनका उद्देश्य केवल प्रचार हासिल करना है। अदालत ने इस प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई।
‘हर नागरिक की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण’
याचिका पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता राज सिंह ने दलील दी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संसद निश्चित रूप से महत्वपूर्ण संस्थान है, लेकिन हर नागरिक की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत को संसदीय लोकतंत्र का महत्व समझाने की आवश्यकता नहीं है।
पीठ ने कहा कि यदि सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है तो केवल संसद ही नहीं, बल्कि देश के अन्य सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट का भी किया जिक्र
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता की चिंता केवल संसद तक ही सीमित क्यों है।
पीठ ने कहा कि देश में रेलवे स्टेशनों पर भगदड़ जैसी घटनाएं होती हैं, हवाई अड्डों पर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां सामने आती हैं और पैदल यात्रियों की सुरक्षा भी एक गंभीर विषय है। यदि सुरक्षा की बात की जाए तो सभी नागरिकों और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा पर समान रूप से विचार होना चाहिए।
इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने संकेत दिया कि किसी एक संस्थान को अलग करके न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करना उचित नहीं माना जा सकता।

याचिका में क्या कहा गया था?
जनहित याचिका में संसद की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में कई घटनाओं और संभावित सुरक्षा चुनौतियों का उल्लेख किया। इनमें प्रमुख रूप से—
- वर्ष 2001 में संसद पर हुआ आतंकी हमला।
- 2023 में लोकसभा की सुरक्षा में हुई सेंध।
- संसद की ओर बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों को जुटाने की हालिया कोशिशों का उल्लेख।
- साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से फैलने वाली गलत सूचनाओं का जोखिम।
- ड्रोन तकनीक और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बदलते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए संसद की सुरक्षा व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराना आवश्यक है।
सरकार की जिम्मेदारी बताया सुरक्षा प्रबंधन
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसद की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार के प्रशासनिक और नीतिगत मामलों में न्यायपालिका तभी हस्तक्षेप करती है जब संवैधानिक या कानूनी अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन सामने आए। इस मामले में ऐसा कोई आधार अदालत को नहीं मिला।
इसी कारण अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया।
जनहित याचिकाओं पर अदालत की टिप्पणी महत्वपूर्ण
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू अदालत की वह टिप्पणी है जिसमें उसने कहा कि हर मुद्दे पर जनहित याचिका दायर करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि जनहित याचिका का उद्देश्य वास्तव में व्यापक सार्वजनिक हित होना चाहिए, न कि प्रचार या अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप की मांग।
क्या है इस फैसले का महत्व?
दिल्ली हाई कोर्ट का यह निर्णय न्यायपालिका और कार्यपालिका की संवैधानिक भूमिकाओं के बीच संतुलन को भी रेखांकित करता है।
अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा नीति बनाना, सुरक्षा व्यवस्था तय करना और उसमें आवश्यक सुधार करना सरकार का दायित्व है। न्यायपालिका केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करेगी जहां कानून या संविधान के उल्लंघन का स्पष्ट प्रश्न सामने आए।