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प्रोफेसर योगेश सिंह: दिल्ली विश्वविद्यालय में दूसरे कार्यकाल से बदलती कहानी

By aonenewstv | Published: Oct 07, 2026 01:15 PM

प्रोफेसर योगेश सिंह और दिल्ली विश्वविद्यालय की बदलती कहानी

नई दिल्ली। 8 अक्टूबर 2026 का दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज होने जा रहा है। इस दिन प्रोफेसर योगेश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में अपने दूसरे पांच वर्षीय कार्यकाल की शुरुआत करेंगे। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी कार्यरत कुलपति के लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त होने का यह पहला अवसर है। इससे पहले सर मॉरिस ग्वायर ने 1938 से 1952 तक दिल्ली विश्वविद्यालय का नेतृत्व किया था।

इतिहास कई बार खुद को दोहराता है, लेकिन हर दौर का संदर्भ अलग होता है। सर मॉरिस ग्वायर के समय दिल्ली विश्वविद्यालय स्वतंत्रता-पूर्व भारत में बौद्धिक और शैक्षणिक निर्माण के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल था। आज का दिल्ली विश्वविद्यालय ज्ञान, तकनीक, नवाचार, शोध और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नए दौर में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में प्रो. योगेश सिंह का दूसरा कार्यकाल केवल प्रशासनिक निरंतरता नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के अगले संस्थागत चरण की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की विरासत

दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना 1922 में हुई थी। अपने शुरुआती दौर से ही विश्वविद्यालय ने देश के बौद्धिक और अकादमिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अलग-अलग समय में अनेक विद्वान शिक्षाविदों और प्रशासकों ने विश्वविद्यालय को दिशा दी और इसकी संस्थागत पहचान को मजबूत किया।

आज करीब एक सदी की यात्रा पूरी कर चुका दिल्ली विश्वविद्यालय देश के प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों में गिना जाता है। बदलते समय के साथ विश्वविद्यालय के सामने भी नई चुनौतियां हैं—शिक्षा के बदलते स्वरूप से लेकर शोध, तकनीक, रोजगार, वैश्विक रैंकिंग और विद्यार्थियों के लिए नए अवसर पैदा करने तक।

लेखक का दिल्ली विश्वविद्यालय से तीन दशक का संबंध

प्रोफेसर के.पी. सिंह के अनुसार, वर्ष 1995 से उनका दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंध रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय को विद्यार्थी, शिक्षक, शिक्षक-कार्यकर्ता और अकादमिक प्रशासक के रूप में करीब तीन दशकों तक नजदीक से देखा है।

प्रो. योगेश सिंह के कार्यकाल के दौरान भी उन्हें विभिन्न जिम्मेदारियों में उनके साथ काम करने का अवसर मिला। इनमें गांधी भवन के निदेशक, पीजी पुरुष छात्रावास के प्रोवोस्ट, पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय शताब्दी समारोह के समन्वयक जैसी भूमिकाएं शामिल हैं।

इसी वजह से प्रो. के.पी. सिंह का मूल्यांकन केवल बाहरी पर्यवेक्षक के तौर पर नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया और विकास यात्रा को करीब से देखने वाले व्यक्ति के तौर पर सामने आता है।

कुलपति की सफलता का पैमाना क्या?

किसी कुलपति की सफलता को केवल भाषणों, बैठकों या योजनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। किसी विश्वविद्यालय का वास्तविक विकास उसके लोगों, पदों, भवनों, नए विषयों, नए अवसरों, शोध और विद्यार्थियों के भविष्य में दिखाई देता है।

प्रो. के.पी. सिंह ने उच्च शिक्षा संस्थान के विकास को पांच प्रमुख पैमानों—People, Places, Programmes, Performance और Possibilities—से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।

इनमें यह देखना महत्वपूर्ण है कि कितने लोगों को रोजगार मिला, कितने शिक्षकों को पदोन्नति मिली, कितने नए विभाग और केंद्र बने, कितने नए भवन तैयार हुए, कितने नए पाठ्यक्रम शुरू हुए, शोध में कितना विस्तार हुआ और विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय तथा वैश्विक पहचान कितनी मजबूत हुई।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विद्यार्थियों के लिए भविष्य के नए अवसर खुले?

पहले कार्यकाल में बड़े पैमाने पर नियुक्तियां

प्रो. योगेश सिंह ने अक्टूबर 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभाला था। उनके पहले कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय में कई बड़े अकादमिक और प्रशासनिक बदलाव हुए। इनमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का क्रियान्वयन, चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम और डिजिटल प्रशासन जैसे बदलाव प्रमुख रहे।

प्रो. के.पी. सिंह के लेख के अनुसार, पहले कार्यकाल में शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर नियुक्तियां और पदोन्नतियां की गईं। लेख में लगभग 5,581 शिक्षण एवं गैर-शिक्षण पदों पर नियुक्तियों का उल्लेख किया गया है।

इनमें विभिन्न महाविद्यालयों में 4,554 सहायक प्रोफेसरों और 40 प्राचार्यों की नियुक्तियां शामिल बताई गई हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर 294 सहायक प्रोफेसर, 162 एसोसिएट प्रोफेसर और 52 प्रोफेसर नियुक्त किए जाने का भी उल्लेख है। इसके अलावा गैर-शैक्षणिक पदों पर भी नियुक्तियां की गईं।

इन नियुक्तियों को विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया है।

शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव

प्रो. योगेश सिंह के पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी पहलों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप दिल्ली विश्वविद्यालय के अकादमिक ढांचे में बदलाव शामिल रहा। विश्वविद्यालय ने चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम लागू किया और छात्रों के लिए बहुविषयक अध्ययन तथा विभिन्न शैक्षणिक विकल्पों को बढ़ाया।

स्नातक प्रवेश व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव आया। CUET-UG और कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम के माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया को अधिक डिजिटल और केंद्रीकृत बनाया गया। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट, डिजिटल प्रशासन और परीक्षा एवं छात्र सेवाओं के डिजिटलीकरण जैसे प्रयासों ने भी विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को प्रभावित किया।

शोध और वैश्विक पहचान पर जोर

पहले कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी जोर दिया गया। शोध, नवाचार, उद्यमिता, विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग और उद्योग से जुड़ाव बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए गए। विश्वविद्यालय ने नई अकादमिक और शोध सुविधाओं के विस्तार पर भी ध्यान दिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से 2026 में जारी जानकारी के मुताबिक, विश्वविद्यालय की वैश्विक रैंकिंग में भी सुधार दर्ज किया गया है।

बदलावों के साथ चुनौतियां भी

हालांकि प्रो. योगेश सिंह का पहला कार्यकाल केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा। NEP और चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम जैसे बड़े बदलावों को लेकर विश्वविद्यालय के भीतर बहस और विरोध भी देखने को मिला। शिक्षकों और छात्रों के एक वर्ग ने बदलावों की प्रक्रिया, परामर्श और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठाए।

प्रवेश प्रक्रिया, पाठ्यक्रम में बदलाव, नियुक्तियों और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर भी अलग-अलग समय में विरोध सामने आया। ऐसे में दूसरे कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती सुधारों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षक और छात्र समुदाय के बीच बेहतर संवाद और विश्वास कायम करना होगी।

हाल के दिनों में छात्र सुरक्षा और हॉस्टल से जुड़े मुद्दों को लेकर भी विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठे हैं। अक्टूबर 2026 में प्रो. योगेश सिंह ने छात्र प्रतिनिधियों और कॉलेज प्राचार्यों के साथ बैठक कर सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की थी।

दूसरा कार्यकाल क्यों है महत्वपूर्ण?

केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में प्रो. योगेश सिंह को दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में दूसरे पांच वर्षीय कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त किया था। यह पुनर्नियुक्ति 8 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो रही है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के नियमों में 2023 में बदलाव के बाद कुलपति के लिए दूसरे लगातार कार्यकाल का रास्ता खुला था। प्रो. योगेश सिंह की पुनर्नियुक्ति इस संशोधित प्रावधान के तहत पहला बड़ा उदाहरण है।

दूसरे कार्यकाल में उनके सामने पहले से शुरू किए गए अकादमिक सुधारों को आगे बढ़ाने, शोध को मजबूत करने, डिजिटल प्रशासन का विस्तार करने, आधारभूत ढांचे को विकसित करने और विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान बढ़ाने जैसी चुनौतियां रहेंगी।

इतिहास में दर्ज होगा नया अध्याय

दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए 8 अक्टूबर 2026 केवल एक नए कार्यकाल की शुरुआत नहीं है। यह उस दौर की शुरुआत है जिसमें विश्वविद्यालय को पारंपरिक अकादमिक विरासत के साथ नई तकनीक, शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी भूमिका तय करनी है।

प्रो. के.पी. सिंह के अनुसार, किसी नेतृत्व की वास्तविक पहचान उसके परिणामों से होती है। यदि नियुक्तियां, पदोन्नतियां, नए पाठ्यक्रम, शोध, भवन, संस्थागत विस्तार और विद्यार्थियों के लिए नए अवसर लंबे समय तक सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं, तो वही उपलब्धियां इतिहास में मील के पत्थर बनती हैं।

प्रो. योगेश सिंह का दूसरा कार्यकाल इसी कसौटी पर परखा जाएगा कि पहले कार्यकाल में शुरू हुए बदलाव कितनी मजबूती से आगे बढ़ते हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय को देश के साथ-साथ वैश्विक उच्च शिक्षा के मानचित्र पर और मजबूत स्थान दिलाने में कितनी सफलता मिलती है।

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