नोआ की नाव माउंट अरारात में है? 1000 मिट्टी के सैंपल से खुलेगा रहस्य, 2027 में आ सकता है जवाब
तुर्की के माउंट अरारात के पास मौजूद दुरुपिनार फॉर्मेशन एक बार फिर चर्चा में है। नाव जैसी आकृति वाली इस प्राकृतिक संरचना को लंबे समय से धार्मिक परंपराओं में वर्णित नोआ की नाव से जोड़ा जाता रहा है। अब 2026 में यहां हुई व्यापक वैज्ञानिक रिसर्च ने इस दावे को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि दुरुपिनार फॉर्मेशन ही नोआ की नाव है।
इस बार रिसर्च में पांच देशों के करीब 20 वैज्ञानिक और छात्र शामिल हुए। टीम ने तुर्की के आगरी प्रांत के डोगुबायाजित इलाके में करीब 90 दिनों तक फील्डवर्क किया। इस दौरान लगभग 150 अलग-अलग स्थानों से करीब 1000 मिट्टी के सैंपल जुटाए गए। साथ ही जमीन के अंदर की संरचना को समझने के लिए कोर सैंपल भी निकाले गए।
जमीन के नीचे क्या दिखा?
2026 की रिसर्च में वैज्ञानिकों ने ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) का इस्तेमाल किया। यह तकनीक जमीन को खोदे बिना उसके नीचे मौजूद परतों और संरचनाओं की तस्वीर तैयार करने में मदद करती है।
रिसर्च टीम को दुरुपिनार फॉर्मेशन के नीचे कुछ असामान्य संरचनाएं दिखाई दीं। इनमें कुछ ऐसे पैटर्न भी बताए गए हैं, जो समकोण जैसी आकृतियां बनाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन संकेतों की प्रकृति समझने के लिए मिट्टी और कोर सैंपल की लैब में जांच जरूरी है।
रडार से मिले संकेत अपने आप में नोआ की नाव के होने का प्रमाण नहीं हैं। वैज्ञानिकों को यह भी जांचना होगा कि ये संरचनाएं प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रिया का परिणाम हैं या इनके पीछे किसी मानवीय संरचना के अवशेष हो सकते हैं।
1000 मिट्टी के सैंपल की होगी जांच
रिसर्च टीम ने करीब 1000 मिट्टी के नमूने जुटाए हैं। इन नमूनों में कार्बन और अन्य जैविक पदार्थों की मौजूदगी की जांच की जाएगी। कुछ शुरुआती विश्लेषणों में फॉर्मेशन के अंदर के नमूनों में आसपास की मिट्टी की तुलना में कार्बन की मात्रा अधिक होने की बात सामने आई है। लेकिन ज्यादा कार्बन मिलना अपने आप में लकड़ी या नाव के अवशेष का प्रमाण नहीं है।
वैज्ञानिकों का लक्ष्य यह पता लगाना है कि मिट्टी में मौजूद कार्बन सामान्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं से आया है या वहां किसी जैविक पदार्थ के पुराने अवशेष मौजूद हैं।
कोर सैंपल भी निकाले गए
जमीन की ऊपरी सतह से मिट्टी के नमूने लेने के साथ-साथ टीम ने जमीन के अंदर से कोर सैंपल भी निकाले हैं। इन नमूनों को आगे प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया है।
कोर सैंपल की जांच इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे वैज्ञानिकों को जमीन के अंदर अलग-अलग परतों की जानकारी मिल सकती है। यदि किसी स्थान पर लकड़ी, मानव निर्मित सामग्री या किसी अन्य असामान्य पदार्थ के अवशेष मिलते हैं तो उनकी अलग से वैज्ञानिक जांच की जा सकती है।
मिट्टी के साथ मिले बर्तनों के टुकड़े
2026 के फील्डवर्क के दौरान शोधकर्ताओं को कुछ मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े भी मिले हैं। शोधकर्ताओं ने इनकी संभावित प्राचीनता को लेकर सवाल उठाए हैं, लेकिन अभी इनकी सही उम्र वैज्ञानिक जांच से तय नहीं हुई है।
इसलिए इन टुकड़ों को फिलहाल नोआ की नाव से जोड़कर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। इनके संबंध में प्रयोगशाला विश्लेषण के बाद ही अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आ सकती है।
2027 में सामने आएंगे रिसर्च के बड़े नतीजे
सिवास जुम्हूरियत यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में चल रही इस परियोजना में 2026 के फील्डवर्क के बाद अब प्रयोगशाला जांच का चरण शुरू हो गया है। विश्वविद्यालय के मुताबिक मिट्टी और कोर सैंपल की जांच सर्दियों के दौरान जारी रहेगी और परियोजना से जुड़े व्यापक निष्कर्ष 2027 में सामने लाने का लक्ष्य है।
इस रिसर्च का नेतृत्व सिवास जुम्हूरियत यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. सेंकर अतिला कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के अनुसार परियोजना में अमेरिका सहित पांच देशों के करीब 20 वैज्ञानिक और छात्र शामिल हुए हैं।
क्या सच में मिल गई नोआ की नाव?
फिलहाल इसका जवाब नहीं है। दुरुपिनार फॉर्मेशन का आकार नाव जैसा जरूर दिखाई देता है और नई रिसर्च में जमीन के नीचे कुछ असामान्य संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक कोई ऐसा निर्णायक पुरातात्विक प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जा सके कि यही नोआ की नाव है।
वैज्ञानिकों के लिए अगला महत्वपूर्ण चरण मिट्टी, कोर और संभावित जैविक सामग्री की प्रयोगशाला जांच है। यदि किसी नमूने में प्राचीन लकड़ी या मानव निर्मित संरचना के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी उम्र और स्रोत की अलग-अलग वैज्ञानिक तकनीकों से पुष्टि करनी होगी।
दुरुपिनार फॉर्मेशन की पहचान 1959 में तुर्की के सेना अधिकारी इल्हान दुरुपिनार ने की थी। इसके बाद से इसकी नाव जैसी आकृति के कारण इसे नोआ की नाव से जोड़कर लगातार चर्चा होती रही है। वहीं कई भूवैज्ञानिक इसे प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना मानते रहे हैं। इसलिए 2026 की रिसर्च का महत्व इस बात में है कि अब वैज्ञानिक रडार, मिट्टी और कोर सैंपल जैसे डेटा के जरिए इस रहस्य को जांचने की कोशिश कर रहे हैं।