छपरौली विधानसभा सीट: RLD का अभेद्य किला, 2027 से पहले सियासी समीकरण पर नजर
बागपत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की छपरौली विधानसभा सीट को राष्ट्रीय लोकदल (RLD) का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है। यह सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और उनके परिवार की किसान राजनीति की विरासत से जुड़ी सीट है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यहां सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं और सभी दल इस मजबूत RLD गढ़ में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
चौधरी चरण सिंह परिवार की विरासत
छपरौली की राजनीति का इतिहास चौधरी चरण सिंह के नाम के बिना अधूरा है। चौधरी चरण सिंह खुद इस सीट से छह बार विधायक रहे। इसके बाद उनकी बेटी सरोज ने 1985 में यहां से चुनाव जीता, जबकि उनके बेटे अजित सिंह भी 1991 में छपरौली से विधायक बने। यही वजह है कि इस सीट को पश्चिमी यूपी में चौधरी चरण सिंह परिवार की सबसे मजबूत राजनीतिक विरासत वाली सीटों में गिना जाता है।
2007 में RLD के अजय तोमर ने यहां जीत दर्ज की। 2012 में वीरपाल राठी ने पार्टी का कब्जा बरकरार रखा। 2017 में सहेंद्र सिंह रमाला ने RLD के टिकट पर बीजेपी उम्मीदवार सतेंद्र सिंह को हराया। हालांकि चुनाव के बाद रमाला बीजेपी में शामिल हो गए और 2022 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े।
2022 में RLD ने फिर अपना दबदबा साबित किया। पार्टी के डॉ. अजय कुमार ने बीजेपी के सहेंद्र सिंह रमाला को 29,508 वोटों के अंतर से हराया। अजय कुमार को 1,11,880 वोट मिले, जबकि रमाला को 82,372 वोट मिले।
2027 से पहले बदला हुआ सियासी माहौल
2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए छपरौली में मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है। मौजूदा RLD विधायक डॉ. अजय कुमार अपने कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों को जनता के बीच रख रहे हैं और दोबारा जीत का दावा कर रहे हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी भी किसान और स्थानीय समस्याओं को मुद्दा बनाकर RLD को चुनौती देने की तैयारी में है।
RLD का बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के साथ होना भी इस सीट के चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में 2027 में RLD के सामने अपने पारंपरिक गढ़ को बचाए रखने की चुनौती होगी, जबकि विपक्षी दल इस मजबूत किले में सेंध लगाने की कोशिश करेंगे।
जाट और मुस्लिम मतदाता अहम
छपरौली के चुनावी गणित में जाट और मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। उपलब्ध अनुमान के मुताबिक यहां करीब 1.30 से 1.32 लाख जाट मतदाता और लगभग 60 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इसके अलावा कश्यप, गुर्जर, अनुसूचित जाति, ब्राह्मण, राजपूत, सैनी और त्यागी समुदाय के मतदाता भी चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं।
हालांकि जातीय आंकड़े अलग-अलग स्रोतों और चुनावों में बदल सकते हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर जाट मतदाताओं की बड़ी संख्या और मुस्लिम मतदाताओं का रुख छपरौली के चुनावी समीकरण में अहम माना जाता है।
किसान और ग्रामीण मुद्दे चुनाव का केंद्र
छपरौली मुख्य रूप से ग्रामीण और कृषि आधारित विधानसभा क्षेत्र है। यहां गन्ने की कीमत, किसानों की समस्याएं, सिंचाई, बिजली, सड़क और यमुना क्षेत्र से जुड़े मुद्दे चुनाव में प्रभावी रहते हैं। क्षेत्र की राजनीति में किसान मुद्दों का महत्व चौधरी चरण सिंह की विरासत के कारण और बढ़ जाता है।
2027 के चुनाव में भी विकास के साथ किसानों और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल अहम रह सकते हैं। RLD अपने विकास कार्यों और राजनीतिक विरासत के सहारे मैदान में उतरने की तैयारी में है, जबकि विपक्षी दल स्थानीय समस्याओं को लेकर सरकार और विधायक को घेरने की कोशिश कर रहे हैं।
RLD के सामने गढ़ बचाने की चुनौती
छपरौली में लंबे समय से RLD का प्रभाव रहा है, लेकिन चुनावी राजनीति में समीकरण स्थायी नहीं होते। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र में RLD को पीछे छोड़ा था, जबकि 2019 और 2024 में RLD ने फिर मजबूत वापसी की। 2024 में बागपत लोकसभा सीट के छपरौली विधानसभा क्षेत्र में RLD ने समाजवादी पार्टी पर 47,225 वोटों की बढ़त बनाई थी।
यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में छपरौली पर पश्चिमी यूपी की राजनीति की खास नजर रहेगी। RLD के लिए यह सीट सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान और चौधरी चरण सिंह की विरासत का प्रतीक भी है। वहीं विपक्ष के लिए यहां जीत दर्ज करना पश्चिमी यूपी में राजनीतिक संदेश देने के लिहाज से बड़ा हासिल होगा।