चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर ओम प्रकाश रावत और अशोक लवासा ने रखी राय, बोले- पारदर्शिता से दूर होगा विवाद
कोच्चि: इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और मौजूदा विवादों को लेकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चर्चा की। दोनों पूर्व चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग की संस्थागत भूमिका, पारदर्शिता और जनता के भरोसे से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 का आयोजन 29 और 30 सितंबर को कोच्चि में किया जा रहा है।
75 साल से ज्यादा का रिकॉर्ड
ओम प्रकाश रावत ने कहा कि चुनाव आयोग ने 75 वर्षों से अधिक समय में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने के मामले में एक मानक स्थापित किया है। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है और संस्थान के कामकाज को लेकर जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने मौजूदा विवादों के संदर्भ में पारदर्शिता पर जोर दिया। रावत के मुताबिक, सिर्फ प्रेस नोट जारी करना पर्याप्त नहीं है। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर लोगों के सामने संबंधित तथ्यों और फैसलों की स्पष्ट जानकारी रखी जानी चाहिए।
‘पूरे तथ्य सार्वजनिक करे चुनाव आयोग’
चर्चा के दौरान दोनों पूर्व चुनाव आयुक्तों ने मौजूदा विवादों के समाधान के लिए पारदर्शिता को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि चुनाव आयोग को संबंधित मामलों में उपलब्ध तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि सवालों और आशंकाओं का समाधान हो सके।
यह चर्चा ऐसे समय हुई है जब चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। हालिया रिपोर्टों में आयोग के भीतर मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर और प्रक्रियाओं पर सवालों का भी जिक्र हुआ है। चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रियाओं को कानून के अनुरूप बताया है और मतदाता सूची की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की जानकारी दी है।
अशोक लवासा ने Form 6 का मुद्दा उठाया
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चर्चा के दौरान Form 6 में किए गए बदलावों का मुद्दा उठाया। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता के नाम को शामिल कराने के लिए किया जाता है।
लवासा ने सवाल उठाया कि Form 6 में बदलाव का फैसला किस प्रक्रिया के तहत किया गया और इस संबंध में पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक की गई या नहीं। उनके मुताबिक, ऐसे बदलावों के पीछे की प्रक्रिया और कारणों की जानकारी सामने आनी चाहिए, ताकि चुनावी प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता बनी रहे।
चुनाव आयोग को केवल तीन आयुक्तों तक सीमित नहीं देखना चाहिए
अशोक लवासा ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को केवल मौजूदा तीन चुनाव आयुक्तों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह एक संस्थागत व्यवस्था है जिसने दशकों के दौरान देश में चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाई है।
लवासा की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक बहस चल रही है। ऐतिहासिक रूप से भी चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग राय सामने आती रही हैं।
SIR को लेकर जारी है राजनीतिक विवाद
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दल चुनाव आयोग की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठाते रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने फैसलों और प्रक्रियाओं को कानूनी प्रावधानों के अनुरूप बताया है। हाल में आयोग ने मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर की समीक्षा के लिए एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी और स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ को शामिल करते हुए समिति बनाने की जानकारी दी।
ऐसे माहौल में पूर्व चुनाव अधिकारियों की ओर से पारदर्शिता और तथ्यों को सार्वजनिक करने पर जोर दिए जाने को चुनावी संस्थाओं में जनता के विश्वास से जुड़े व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
संस्था की विश्वसनीयता पर जोर
ओम प्रकाश रावत और अशोक लवासा की चर्चा का प्रमुख मुद्दा यह रहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव परिणामों से नहीं, बल्कि उसकी निर्णय प्रक्रिया और सार्वजनिक संवाद से भी जुड़ी है। दोनों ने मौजूदा सवालों के समाधान के लिए अधिक पारदर्शिता और तथ्यों को सामने रखने की जरूरत पर जोर दिया।
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 में ‘Election Commission on Trial: Are India’s Elections Free and Fair?’ विषय पर दोनों पूर्व चुनाव अधिकारियों का यह सत्र आयोजित किया गया। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार यह सत्र 29 सितंबर को हुआ।