31 साल बाद मां से मिला बिछड़ा बेटा: 9 साल की उम्र में ट्रेन से खोया पिंटू यादव, अब्दुल जब्बार बनकर लौटा घर
बिहार से पश्चिम बंगाल पहुंच गया था मासूम पिंटू, मुस्लिम परिवार ने दिया सहारा; तीन दशक बाद सोशल मीडिया की मदद से मिला अपना परिवार, मां मीना देवी की आंखों से छलके खुशी के आंसू
बिहार, 24 अक्टूबर 2026। कहते हैं कि मां और बेटे का रिश्ता समय, दूरी और परिस्थितियों से कहीं अधिक मजबूत होता है। बिहार से सामने आई एक भावुक कहानी ने इस बात को एक बार फिर साबित कर दिया है। करीब 31 साल पहले महज नौ साल की उम्र में अपने परिवार से बिछड़ा पिंटू यादव आखिरकार अपनी मां और पिता से मिल गया। बचपन में ट्रेन के सफर के दौरान घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल पहुंचा पिंटू अब अब्दुल जब्बार के नाम से जाना जाता है।
तीन दशक से अधिक समय तक अपने बेटे के लौटने की उम्मीद लगाए बैठे परिवार के लिए यह मुलाकात किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जब पिंटू अपने माता-पिता के सामने पहुंचा तो वर्षों की जुदाई के बाद परिवार में खुशी का माहौल बन गया।
इस कहानी की सबसे खास बात यह है कि बचपन में घर से बिछड़ने के बाद पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम परिवार ने पिंटू को सहारा दिया। वहीं उसका पालन-पोषण हुआ और समय के साथ उसकी जिंदगी एक नई दिशा में आगे बढ़ती गई।
नौ साल की उम्र में दोस्तों के साथ ट्रेन में चढ़ा था पिंटू
जानकारी के अनुसार, बिहार के कांटाकोश गांव के रहने वाले मोतीलाल यादव का दूसरा बेटा पिंटू यादव बचपन में अपने दोस्तों के साथ ट्रेन में चढ़ गया था।
उस समय पिंटू की उम्र लगभग नौ वर्ष थी। बचपन की नासमझी में शुरू हुआ यह सफर उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
बताया जाता है कि ट्रेन में सफर के दौरान पिंटू को नींद आ गई। जब उसकी आंख खुली तो वह अपने घर और गांव से काफी दूर पहुंच चुका था।
अनजान जगह, अपरिचित लोग और घर लौटने का रास्ता मालूम न होने के कारण मासूम पिंटू घबरा गया।
उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां पहुंच गया है और अपने माता-पिता के पास कैसे लौटेगा।
पश्चिम बंगाल पहुंचकर रोने लगा मासूम बच्चा
घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल पहुंचने के बाद पिंटू बेहद परेशान हो गया।
नौ साल का बच्चा न तो अपने घर लौटने का रास्ता जानता था और न ही उसके पास परिवार से संपर्क करने का कोई साधन था।
अनजान स्थान पर अकेला पड़ जाने के कारण वह रोने लगा।
इसी दौरान उसे एक मुस्लिम परिवार का सहारा मिला। परिवार ने बच्चे की स्थिति को समझते हुए उसे अपने पास रखा और उसकी देखभाल की।
धीरे-धीरे पिंटू का जीवन पश्चिम बंगाल में आगे बढ़ने लगा।
मुस्लिम परिवार ने दिया सहारा, पिंटू से बना अब्दुल जब्बार
पश्चिम बंगाल में जिस मुस्लिम परिवार ने पिंटू को सहारा दिया, उसके साथ रहते हुए उसकी पहचान अब्दुल जब्बार के नाम से होने लगी।
बचपन में अपने परिवार से बिछड़ने के बाद पिंटू की परवरिश नए परिवेश में हुई।
समय के साथ उसने अपनी जिंदगी वहीं आगे बढ़ाई। उसका विवाह हुआ और वह अपने परिवार के साथ रहने लगा।
हालांकि, बचपन की यादें और अपने असली माता-पिता से मिलने की इच्छा उसके मन में बनी रही।
वह अपने गांव और परिवार को तलाशना चाहता था, लेकिन इतने वर्षों के बाद सीमित यादों के आधार पर सही जगह तक पहुंचना आसान नहीं था।
उधर बेटे के इंतजार में गुजरते रहे मां-बाप के साल
दूसरी ओर बिहार में पिंटू के माता-पिता अपने लापता बेटे की तलाश करते रहे।
मोतीलाल यादव और उनकी पत्नी मीना देवी के लिए बेटे का अचानक लापता हो जाना बेहद पीड़ादायक था।
परिवार ने पिंटू को खोजने का प्रयास किया, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका।
समय बीतता गया। महीने वर्षों में बदल गए और परिवार की जिंदगी आगे बढ़ती रही, लेकिन बेटे की याद बनी रही।
जिस बच्चे को माता-पिता ने बचपन में अपनी गोद में खिलाया था, उसके बारे में तीन दशक से अधिक समय तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।
अब्दुल जब्बार ने भी नहीं छोड़ी परिवार को खोजने की कोशिश
पश्चिम बंगाल में रहने के दौरान अब्दुल जब्बार ने भी अपने जन्म देने वाले माता-पिता और पैतृक गांव को खोजने की कोशिश की।
उसे बचपन की कुछ बातें याद थीं, लेकिन इतने लंबे समय के बाद उन यादों के सहारे अपने गांव तक पहुंचना कठिन साबित हुआ।
जानकारी के अनुसार, उसने पहले भी अपने परिवार को तलाशने के प्रयास किए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली।
इसके बावजूद उसने अपनी खोज जारी रखी।
आखिरकार सोशल मीडिया के माध्यम से मिले सुराग ने उसकी वर्षों पुरानी तलाश को नई दिशा दी।
सोशल मीडिया पर तस्वीरों से मिला परिवार का सुराग
पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार की घर वापसी में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई।
बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर तस्वीरें दिखाई देने के बाद उसे अपने परिवार और गांव के बारे में जानकारी जुटाने में मदद मिली।
इन जानकारियों के आधार पर उसने दोबारा अपने पैतृक गांव तक पहुंचने का प्रयास किया।
पहले किए गए प्रयास सफल नहीं हो सके थे, लेकिन तीसरी कोशिश में वह आखिरकार अपने घर तक पहुंचने में सफल हो गया।
करीब 31 वर्षों बाद अपने गांव लौटना उसके लिए बेहद भावुक क्षण था।
31 साल बाद मां मीना देवी से हुई मुलाकात
जब पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार अपने माता-पिता के सामने पहुंचा तो परिवार की वर्षों पुरानी प्रतीक्षा समाप्त हो गई।
मां मीना देवी के लिए यह मुलाकात विशेष रूप से भावुक थी।
जिस बेटे को उन्होंने बचपन में खो दिया था, वह अब एक वयस्क व्यक्ति और अपने परिवार का मुखिया बनकर उनके सामने खड़ा था।
तीन दशक से अधिक समय के अंतराल ने पिंटू के जीवन में बहुत कुछ बदल दिया था, लेकिन मां-बेटे का रिश्ता कायम रहा।
पिता मोतीलाल यादव के लिए भी बेटे की घर वापसी खुशी का अवसर बनी।
बहू और पोते-पोतियों को भी अपनाने के लिए तैयार मां
इस कहानी का एक और भावुक पहलू यह है कि पिंटू अब अकेला नहीं है। उसका अपना परिवार भी है।
मां मीना देवी ने अपने बेटे के साथ उसकी पत्नी और बच्चों को भी खुशी से स्वीकार करने की इच्छा जताई है।
परिवार के लिए यह केवल खोए हुए बेटे की वापसी नहीं, बल्कि नए रिश्तों से जुड़ने का अवसर भी बन गया है।
बेटे के साथ बहू और पोते-पोतियों के परिवार में शामिल होने की संभावना ने घर की खुशियों को और बढ़ा दिया है।
धर्म और पहचान से ऊपर उठकर सामने आई इंसानियत की कहानी
पिंटू यादव की कहानी में मानवीय संवेदनाओं का महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आता है।
एक हिंदू परिवार में जन्मे बच्चे को पश्चिम बंगाल के मुस्लिम परिवार ने उस समय सहारा दिया, जब वह अपने माता-पिता से बिछड़कर अनजान जगह पहुंच गया था।
वर्षों बाद वही बच्चा अब्दुल जब्बार के नाम से अपने जन्म देने वाले माता-पिता के पास लौटा।
उसकी जिंदगी में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक परिवेश जुड़े, लेकिन परिवार और अपनत्व की भावना बनी रही।
यह घटना बताती है कि कठिन परिस्थितियों में किसी जरूरतमंद बच्चे की सहायता करना उसके जीवन को नई दिशा दे सकता है।
तीन दशक में बदल गई जिंदगी, लेकिन नहीं भूला अपना गांव
31 वर्षों का समय किसी भी व्यक्ति के जीवन में बहुत लंबा होता है।
जब पिंटू अपने परिवार से बिछड़ा था, तब वह केवल नौ साल का बच्चा था। आज वह लगभग 40 वर्ष की उम्र में अपने माता-पिता से मिला है।
इस दौरान उसका बचपन बीता, युवावस्था आई और उसने अपना परिवार बसाया।
हालांकि, इतने वर्षों के बाद भी अपने जन्मस्थान और माता-पिता की तलाश उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही।
आखिरकार उसकी लगातार कोशिशों और सोशल मीडिया से मिले सुराग ने उसे अपने परिवार तक पहुंचा दिया।
लापता बच्चों के मामलों में पहचान और पुनर्मिलन का महत्व
पिंटू यादव की घटना उन परिवारों की पीड़ा को भी सामने लाती है, जिनके बच्चे किसी कारणवश लापता हो जाते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में बच्चों की पहचान, सुरक्षित देखभाल और परिवार से संपर्क स्थापित करने की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।
आज तकनीक और डिजिटल माध्यमों की मदद से बिछड़े परिवारों को खोजने के नए अवसर उपलब्ध हुए हैं।
हालांकि, किसी लापता बच्चे के मिलने पर उसकी सुरक्षा, पहचान की पुष्टि और संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना भी आवश्यक है।
गांव में बेटे की वापसी से खुशी का माहौल
करीब 31 साल बाद पिंटू यादव के अपने पैतृक गांव लौटने से परिवार में खुशी का माहौल है।
माता-पिता के लिए यह मुलाकात वर्षों के इंतजार का अंत है, जबकि पिंटू के लिए अपनी बचपन की पहचान और परिवार से दोबारा जुड़ने का अवसर है।
उसकी कहानी में बचपन की जुदाई, अनजान परिवार का सहारा, वर्षों की तलाश और आखिरकार घर वापसी जैसे कई भावुक पड़ाव शामिल हैं।
बिहार के पिंटू यादव उर्फ अब्दुल जब्बार की यह कहानी केवल एक बिछड़े बेटे के घर लौटने की घटना नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदना, पारिवारिक प्रेम और उम्मीद की मिसाल भी है। नौ साल की उम्र में ट्रेन से बिछड़ा बच्चा 31 साल बाद अपनी मां मीना देवी और पिता मोतीलाल यादव से मिल सका। इस पुनर्मिलन ने पूरे परिवार को नई खुशियां दी हैं और यह संदेश भी दिया है कि समय और दूरी के बावजूद अपनों को खोजने की उम्मीद बनी रह सकती है।