कानपुर में जाम में फंसी एंबुलेंस, पिता हाथ जोड़कर मांगते रहे रास्ता, UP पुलिस के सिपाही प्रांशु सचान की मौत
कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने शहर की ट्रैफिक व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल बेटे को बचाने के लिए एक पिता सड़क पर लोगों के सामने हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा। कभी वह ट्रैफिक पुलिसकर्मियों से गुहार लगाता तो कभी गाड़ियों के बीच खड़े होकर लोगों से एंबुलेंस को आगे जाने देने की अपील करता रहा। लेकिन एंबुलेंस जाम में फंसी रही और अस्पताल पहुंचने से पहले ही घायल सिपाही की मौत हो गई।
मृतक की पहचान 22 वर्षीय प्रांशु सचान के रूप में हुई है। वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही था और उसकी तैनाती अंबेडकरनगर जिले की टांडा कोतवाली में थी। प्रांशु मूल रूप से कानपुर के घाटमपुर थाना क्षेत्र के मोतीपुर गांव का रहने वाला था।
डंपर की टक्कर से गंभीर रूप से घायल हुआ था सिपाही
जानकारी के मुताबिक, प्रांशु विभागीय काम से अलग-अलग जिलों में सम्मन तामील कराने निकला था। इस दौरान उसकी मुलाकात रास्ते में अपने पिता प्रमोद सचान से हो गई। इसके बाद पिता भी उसके साथ बाइक पर बैठ गए।
फतेहपुर जिले के कल्याणपुर क्षेत्र में बक्सर मोड़ के पास पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार डंपर ने उनकी बाइक में टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि पिता-पुत्र सड़क पर गिर पड़े। बाइक पर पीछे बैठे प्रांशु के ऊपर डंपर का पहिया चढ़ गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। पिता को मामूली चोटें आईं।
हादसे के बाद डंपर चालक मौके से फरार हो गया। स्थानीय लोगों की सूचना पर पुलिस पहुंची और दोनों घायलों को अस्पताल ले जाया गया। प्रांशु की गंभीर हालत देखते हुए डॉक्टरों ने उसे कानपुर के हैलट अस्पताल रेफर कर दिया।
टाटमिल चौराहे पर जाम में फंसी एंबुलेंस
प्रांशु को एंबुलेंस से कानपुर लाया जा रहा था। लेकिन शहर के टाटमिल चौराहे पर पहुंचते ही एंबुलेंस भीषण ट्रैफिक जाम में फंस गई। पिता प्रमोद सचान के मुताबिक, एंबुलेंस काफी देर तक जाम में फंसी रही और बेटा लगातार दर्द से तड़प रहा था।
प्रांशु के शरीर से खून बह रहा था। पिता कभी अपने हाथों से खून रोकने की कोशिश करते तो कभी कपड़े से घाव पर दबाव बनाते। बेटे की हालत बिगड़ती देख वह एंबुलेंस से नीचे उतरे और सड़क पर मौजूद लोगों से रास्ता देने की गुहार लगाने लगे।
पिता हाथ जोड़कर मांगते रहे रास्ता
इस घटना का सबसे भावुक पहलू पिता की बेबसी रही। बेटे की जान बचाने के लिए वह कभी ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के सामने हाथ जोड़ते तो कभी वाहन चालकों और राहगीरों से रास्ता देने की विनती करते रहे।
पिता बार-बार लोगों से कहते रहे कि उनके बेटे का एक्सीडेंट हुआ है और उसे जल्द अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। पुलिसकर्मियों ने भी एंबुलेंस को निकालने की कोशिश की, लेकिन वाहनों की लंबी कतारों के कारण रास्ता नहीं बन सका।
प्रमोज सचान की गुहार थी कि किसी तरह एंबुलेंस को रास्ता मिल जाए, ताकि उनके बेटे को समय पर इलाज मिल सके। लेकिन जाम के कारण एंबुलेंस की रफ्तार थमी रही।
हैलट अस्पताल पहुंचने से पहले टूट गई सांसें
किसी तरह एंबुलेंस हैलट अस्पताल पहुंची, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद प्रांशु को मृत घोषित कर दिया। बेटे की मौत की खबर सुनते ही पिता बदहवास हो गए और अस्पताल में ही फूट-फूटकर रोने लगे।
पिता का आरोप है कि जाम के कारण बेटे को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका। उन्होंने बताया कि एंबुलेंस को रास्ता दिलाने के लिए वह लगातार लोगों और पुलिसकर्मियों से गुहार लगाते रहे।
रैली के दौरान जाम लगने का आरोप
परिजनों ने आरोप लगाया कि शहर में आयोजित भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ’ रैली के कारण कई जगह ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी हुई थी। इसी दौरान टाटमिल चौराहे पर एंबुलेंस फंस गई।
हालांकि, ट्रैफिक पुलिस की ओर से इस आरोप पर अलग पक्ष सामने आया है। डीसीपी ट्रैफिक अभयनाथ त्रिपाठी के अनुसार, एंबुलेंस फतेहपुर से दोपहर करीब 2:40 बजे रवाना हुई थी और डॉक्टरों ने शाम करीब 4 बजे सिपाही की मौत की सूचना दी। पुलिस का कहना है कि फतेहपुर से हैलट अस्पताल तक की दूरी लगभग 50 से 55 किलोमीटर है और सामान्य परिस्थितियों में भी इस दूरी को तय करने में करीब एक से डेढ़ घंटे लगते हैं।
इसलिए पुलिस ने एंबुलेंस के समय पर पहुंचने की बात कही है। दूसरी तरफ, परिवार ने जाम में फंसने के कारण इलाज में देरी होने का आरोप लगाया है।
परिवार में पसरा मातम
प्रांशु सचान की मौत से मोतीपुर गांव में मातम छा गया। परिवार में पिता प्रमोद सचान, मां विभा सचान और बहन चांदनी सचान हैं। इकलौते बेटे को खोने के बाद परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।
प्रांशु वर्ष 2025 बैच का पुलिस कांस्टेबल था। उसके शव का पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद पार्थिव शरीर को पैतृक गांव ले जाया गया, जहां पुलिस विभाग की ओर से उसे अंतिम सलामी दी गई।
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़ा करती है कि गंभीर मरीजों को ले जा रही एंबुलेंस के लिए शहरों में जाम के दौरान रास्ता सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। आपातकालीन स्थिति में कुछ मिनटों की देरी भी किसी की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।