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Piyush Goyal Berlin Climate Speech: जलवायु परिवर्तन पर यूरोप को दो टूक जवाब, भारत की जिम्मेदारी पर उठाए सवाल

By aonenewstv | Published: Oct 23, 2026 06:44 AM

बर्लिन में पीयूष गोयल का यूरोप को दो टूक जवाब: जलवायु संकट के लिए सभी देश बराबर जिम्मेदार नहीं, कार्बन टैक्स पर भी उठाए सवाल

उपशीर्षक: केंद्रीय मंत्री ने विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी का उठाया मुद्दा, कहा—भारत में दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में हिस्सेदारी तीन प्रतिशत से भी कम

नई दिल्ली/बर्लिन, 23 अक्टूबर 2026।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जलवायु परिवर्तन को लेकर विकसित देशों, विशेषकर यूरोप के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने जलवायु संकट के लिए विकसित और विकासशील देशों को समान रूप से जिम्मेदार ठहराने की सोच को चुनौती देते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी तय करते समय देशों के ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन, आर्थिक विकास और ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

गोयल ने कहा कि भारत जैसे विकासशील देशों पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समान उत्सर्जन कटौती का दबाव बनाना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने वैश्विक जलवायु नीति में समानता, ऐतिहासिक जिम्मेदारी और विकासशील देशों के अधिकारों को महत्व देने की आवश्यकता बताई।

केंद्रीय मंत्री ने यूरोपीय संघ की कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए जलवायु संरक्षण के नाम पर व्यापार संबंधी बाधाएं पैदा किए जाने को लेकर चिंता व्यक्त की।

दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी भारत में, उत्सर्जन में हिस्सेदारी तीन प्रतिशत से कम: गोयल

बर्लिन में अपने संबोधन के दौरान पीयूष गोयल ने भारत की जनसंख्या और कार्बन उत्सर्जन के बीच अंतर को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि भारत में विश्व की लगभग 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश का योगदान तीन प्रतिशत से भी कम है।

केंद्रीय मंत्री ने इस तुलना के माध्यम से यह तर्क रखा कि केवल किसी देश की जनसंख्या या आर्थिक गतिविधियों के आधार पर उसे जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन की समस्या को समझने के लिए ऐतिहासिक उत्सर्जन और औद्योगिक विकास के दौरान जीवाश्म ईंधन के उपयोग को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

हालांकि, उत्सर्जन संबंधी आंकड़ों की तुलना करते समय यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि वे वार्षिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन या ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन में से किस आधार पर दिए गए हैं।

विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी का मुद्दा उठाया

पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित और विकासशील देशों को बराबर जिम्मेदार ठहराने की अवधारणा पर आपत्ति जताई।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूरोप और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने औद्योगिकीकरण के लंबे दौर में बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन का उपयोग किया।

कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के व्यापक उपयोग से औद्योगिक उत्पादन, परिवहन और आर्थिक विकास को गति मिली, लेकिन इसके साथ वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी बढ़ी।

भारत का पक्ष रहा है कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है, उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में यह विचार ‘साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं’ के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।

इस सिद्धांत के अनुसार, जलवायु संरक्षण सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन प्रत्येक देश की ऐतिहासिक भूमिका और आर्थिक क्षमता अलग-अलग होने के कारण उनके दायित्व भी अलग हो सकते हैं।

1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

केंद्रीय मंत्री ने भारत की विकास संबंधी आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतें, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास देश की महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं हैं।

भारत को अपनी बढ़ती आबादी के लिए बिजली, परिवहन, उद्योग, कृषि और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना है।

गोयल के तर्क का मुख्य आधार यह रहा कि विकासशील देशों को आर्थिक प्रगति और गरीबी उन्मूलन के अवसरों से वंचित करके जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

उन्होंने विकसित देशों की तुलना में भारत की परिस्थितियों को अलग बताते हुए जलवायु नीतियों में विकास संबंधी आवश्यकताओं को उचित स्थान देने की बात कही।

भारत ऊर्जा परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार के साथ आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने की नीति पर जोर देता रहा है।

प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन पर भी ध्यान देना जरूरी

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय बहस में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन एक महत्वपूर्ण मानक माना जाता है।

किसी देश का कुल उत्सर्जन अधिक होने के बावजूद उसकी बड़ी आबादी के कारण प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम हो सकता है।

इसी आधार पर भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि विकसित देशों और विकासशील देशों की तुलना करते समय केवल कुल उत्सर्जन को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है।

विकसित देशों में ऐतिहासिक रूप से अधिक ऊर्जा खपत, औद्योगिक गतिविधियों और उपभोग के स्तर ने प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को प्रभावित किया है।

वहीं विकासशील देशों के सामने अभी भी ऊर्जा पहुंच, रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार और जीवन स्तर में सुधार जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।

गोयल ने इन्हीं असमानताओं को ध्यान में रखते हुए जलवायु न्याय की आवश्यकता पर जोर दिया।

जलवायु वित्त के अधूरे वादों पर उठाए सवाल

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने विकसित देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के वादों पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए आर्थिक संसाधनों तथा तकनीकी सहयोग की आवश्यकता होती है।

गोयल ने जलवायु वित्त से जुड़े पुराने आश्वासनों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि वर्षों बाद भी वादे के अनुरूप सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।

उन्होंने इस मुद्दे पर विकसित देशों की प्रतिबद्धता और वास्तविक कार्रवाई के बीच अंतर को रेखांकित किया।

जलवायु वित्त की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों के लिए वर्ष 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य लंबे समय तक प्रमुख विषय रहा है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय आकलनों में यह लक्ष्य वर्ष 2022 में पूरा होने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद सहायता की गुणवत्ता, ऋण और अनुदान के अनुपात तथा वास्तविक जरूरतों के मुकाबले वित्तीय संसाधनों की पर्याप्तता को लेकर विवाद जारी रहे हैं।

यूरोपीय संघ के CBAM पर भी जताई आपत्ति

पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ की कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।

CBAM यूरोपीय संघ की ऐसी नीति है, जिसके अंतर्गत कुछ आयातित वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के आधार पर कार्बन लागत लागू करने की व्यवस्था बनाई गई है।

इसका उद्देश्य यूरोपीय संघ के भीतर और बाहर उत्पादित वस्तुओं पर कार्बन संबंधी लागत में अंतर को कम करना तथा कार्बन लीकेज की समस्या से निपटना बताया जाता है।

लेकिन भारत सहित कई विकासशील देशों की चिंता है कि ऐसी व्यवस्था उनके निर्यात और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है।

विशेष रूप से इस्पात, एल्युमीनियम और अन्य कार्बन-गहन क्षेत्रों से जुड़े निर्यातकों के लिए अतिरिक्त अनुपालन लागत और व्यापार संबंधी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।

गोयल ने जलवायु संरक्षण की नीतियों को व्यापारिक बाधाओं का माध्यम बनाए जाने की आशंका पर जोर दिया।

क्या जलवायु संरक्षण के नाम पर बढ़ेंगी व्यापारिक बाधाएं?

यूरोपीय संघ की CBAM नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।

यूरोपीय संघ का तर्क है कि कार्बन लागत लागू करने से उद्योगों को स्वच्छ उत्पादन तकनीकों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और यूरोपीय जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

दूसरी ओर, भारत जैसे विकासशील देशों की चिंता है कि ऐसी नीतियों का आर्थिक बोझ उन देशों पर भी पड़ सकता है, जिनका ऐतिहासिक उत्सर्जन विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम रहा है।

इस विवाद में पर्यावरण संरक्षण, निष्पक्ष व्यापार, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और विकासशील देशों के आर्थिक हित जैसे कई मुद्दे शामिल हैं।

गोयल के बयान ने जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को फिर से सामने रखा है।

जलवायु न्याय के बिना समाधान अधूरा

पीयूष गोयल ने अपने संबोधन में जलवायु न्याय के सिद्धांत को महत्वपूर्ण बताया।

जलवायु न्याय का अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की नीतियां बनाते समय विभिन्न देशों और समुदायों की परिस्थितियों, संसाधनों तथा ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखा जाए।

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह पक्ष रखता रहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों को वित्तीय सहायता, तकनीकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण में अधिक योगदान देना चाहिए।

इसके साथ ही विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन, आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।

भारत के लिए विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों जरूरी

भारत के सामने एक ओर तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी भी है।

देश में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से ऊर्जा परिवर्तन को गति देने का प्रयास किया जा रहा है।

भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का दीर्घकालिक लक्ष्य भी निर्धारित किया है।

ऐसे में भारत का प्रयास आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित करने का है।

गोयल का बयान इसी व्यापक नीति दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है, जिसमें भारत विकासशील देशों की आवश्यकताओं को अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीतियों में उचित महत्व देने की मांग करता रहा है।

विकसित देशों को अधिक जिम्मेदारी उठाने का संदेश

बर्लिन में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के संबोधन का प्रमुख संदेश यह रहा कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है, लेकिन इसके समाधान के लिए सभी देशों पर समान दायित्व लागू करना उचित नहीं होगा।

उन्होंने विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकासशील देशों की ऊर्जा आवश्यकताओं, जलवायु वित्त और यूरोपीय संघ की कार्बन संबंधी व्यापार नीति जैसे मुद्दों को उठाया।

केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण की वैश्विक रणनीति न्यायसंगत, व्यावहारिक और विकासशील देशों की आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए।

बर्लिन से दिया गया उनका यह संदेश अंतरराष्ट्रीय जलवायु चर्चा में भारत के उस रुख को सामने लाता है, जिसके अनुसार जलवायु संकट से निपटने के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी, वित्तीय सहयोग और विकास के अधिकार के बीच संतुलन आवश्यक है।

 

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