नई दिल्ली: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे वकीलों के साथ कथित मारपीट के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने CBI जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस गिरिश कठपालिया ने कहा कि याचिका अपने मौजूदा रूप में सुनवाई योग्य नहीं है और शिकायतकर्ताओं के पास कानून में उपलब्ध वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं।
पहले पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क करने की बात
अदालत ने कहा कि शिकायत करने वाले वकीलों को सीधे हाईकोर्ट में CBI जांच की मांग करने के बजाय पहले संबंधित पुलिस उपायुक्त (DCP) के पास जाना चाहिए था। यदि वहां से उचित कार्रवाई नहीं होती, तो संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराने का विकल्प भी उपलब्ध था।
कोर्ट ने BNSS की धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत का रास्ता भी बताया। अदालत के मुताबिक इस वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किए बिना सीधे रिट याचिका के जरिए CBI जांच की मांग करने का आधार नहीं बनता।
20-21 अगस्त की रात का है मामला
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 20 और 21 अगस्त की दरमियानी रात BCI कार्यालय परिसर में करीब 10 वकील प्रदर्शन कर रहे थे। आरोप है कि रात करीब 1:15 बजे 25 से 30 लोग वहां पहुंचे और प्रदर्शन कर रहे वकीलों के साथ मारपीट की। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इनमें से कुछ लोग वकीलों की पोशाक में थे और घटना के दौरान पुलिसकर्मी भी मौके पर मौजूद थे।
याचिका में इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने और FIR दर्ज करने के लिए CBI को निर्देश देने की मांग की गई थी।
दिल्ली पुलिस पर अविश्वास को लेकर कोर्ट की टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई थी कि मनन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़े सांसद हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती और मामले की जांच CBI से कराई जानी चाहिए।
इस दलील पर हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस पर अविश्वास जताने के लिए कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के सत्तारूढ़ दल से जुड़े होने के आधार पर पूरी दिल्ली पुलिस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि CBI भी एक सरकारी जांच एजेंसी है।
कोर्ट ने संज्ञेय अपराध के पहलू पर भी बात की
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद शिकायतों को देखते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा संज्ञेय अपराध स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता, जिसके आधार पर हाईकोर्ट सीधे किसी एजेंसी को FIR दर्ज करने और जांच का निर्देश दे।
कोर्ट के मुताबिक, उपलब्ध आरोपों के आधार पर मामला चोट पहुंचाने जैसे गैर-संज्ञेय अपराध के दायरे में आता दिखाई देता है, जिसकी प्रक्रिया मजिस्ट्रेट के स्तर पर आगे बढ़ सकती है।
BCI से जुड़े विवाद के बीच हुआ था प्रदर्शन
वकीलों का प्रदर्शन BCI की ओर से NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 ग्रेजुएटिंग बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने से जुड़े विवाद के बाद हुआ था। रिपोर्टों के मुताबिक, इस फैसले की आलोचना के बाद BCI ने बाद में संबंधित निर्देश वापस ले लिया था। इसी विवाद के दौरान BCI परिसर में वकीलों के प्रदर्शन और कथित मारपीट का मामला सामने आया।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने शिकायतकर्ताओं को उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने की ओर इशारा किया है। यानी संबंधित DCP के पास शिकायत करने और जरूरत पड़ने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष मामला ले जाने का रास्ता खुला है।
हाईकोर्ट के इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि कथित मारपीट की घटना के संबंध में किसी अन्य कानूनी प्रक्रिया पर रोक लग गई है। शिकायतकर्ता उपलब्ध कानूनी उपायों के जरिए आगे कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।