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100 घरों का गांव, 4 साल में 17 FIDE-रेटेड खिलाड़ी! एक टीचर ने बदली बच्चों की जिंदगी, कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान

By varunendrakathuria@gmail.com | Published: Aug 07, 2026 05:44 PM

अहमदाबाद। जहां बड़े शहरों में बच्चों को खेलों की ट्रेनिंग दिलाने के लिए महंगी अकादमियों और आधुनिक सुविधाओं की जरूरत महसूस होती है, वहीं गुजरात का एक छोटा-सा गांव अपनी अलग कहानी लिख रहा है। महीसागर जिले के करीब 100 घरों वाले रतुसिंह ना मुवाडा गांव ने महज चार साल में 17 FIDE-रेटेड शतरंज खिलाड़ी तैयार कर दिए हैं।

इस गांव की खासियत सिर्फ इतनी नहीं है कि यहां से बड़ी संख्या में शतरंज खिलाड़ी निकले हैं। खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर बच्चे खेत मजदूरों और दिहाड़ी मजदूरों के परिवारों से आते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इन बच्चों ने प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए अब तक 120 ट्रॉफियां और 179 मेडल अपने नाम किए हैं।

एक शिक्षक ने देखा बड़ा सपना

इस पूरी शतरंज मुहिम के पीछे 45 वर्षीय गणित शिक्षक संदीप उपाध्याय हैं। वह सरकारी स्कूल बाल वाटिका में पढ़ाते हैं। साल 2021 में उन्होंने गांव के बच्चों को शतरंज सिखाने की शुरुआत की।

शुरुआत किसी बड़ी अकादमी से नहीं हुई थी। गांव में सीमित संसाधन थे और स्कूल की स्थिति भी बेहतर नहीं थी। पांच कमरों वाले जर्जर स्कूल में पढ़ाई होती थी और कई बच्चों को खुले में बैठकर पढ़ना पड़ता था। इसके बावजूद संदीप उपाध्याय ने बच्चों में छिपी प्रतिभा को पहचानने की कोशिश की।

उन्होंने बच्चों को शतरंज की बिसात से जोड़ना शुरू किया और धीरे-धीरे यह प्रयास एक बड़े अभियान में बदल गया।

चार साल में सामने आया चौंकाने वाला परिणाम

जिस अभियान की शुरुआत एक छोटे से गांव से हुई थी, उसके नतीजे अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुके हैं।

सिर्फ चार साल के भीतर गांव से 17 FIDE-रेटेड खिलाड़ी तैयार हो चुके हैं। FIDE रेटिंग अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ की ओर से खिलाड़ियों के प्रदर्शन और उनकी क्षमता को आंकने वाली आधिकारिक रेटिंग व्यवस्था है।

गांव के बच्चों ने 24 राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में हिस्सा लिया और इनमें से 22 प्रतियोगिताओं में टॉप-3 में जगह बनाई। पिछले दिसंबर में गांधीनगर में आयोजित स्टूडेंट्स चेस फेस्टिवल में बाल वाटिका को बेस्ट इंस्टीट्यूट चुना गया।

इसके अलावा गांव के 21 बच्चों को सरकारी डिस्ट्रिक्ट लेवल स्पोर्ट्स स्कूल में मुफ्त शिक्षा और कोचिंग का अवसर भी मिला।

बच्चों की ट्रेनिंग के लिए खुद खर्च करते हैं शिक्षक

संदीप उपाध्याय का योगदान सिर्फ बच्चों को शतरंज सिखाने तक सीमित नहीं है। बताया गया है कि वह अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा बच्चों की प्रतियोगिता फीस, यात्रा, किताबों और शतरंज किट पर खर्च करते हैं।

बच्चों को बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए ग्रैंडमास्टर अंकित राजपरा भी हर महीने गांव पहुंचकर खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देते हैं।

संदीप उपाध्याय का सपना इससे भी बड़ा है। वह ऐसा केंद्र बनाना चाहते हैं जहां देश के अलग-अलग गांवों से आने वाले प्रतिभाशाली बच्चों को बिना आर्थिक बाधा के विश्वस्तरीय शतरंज प्रशिक्षण मिल सके। उनका लक्ष्य बच्चों को शतरंज के साथ-साथ GPSC और UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का अवसर देना भी है।

खेत मजदूर की बेटी ने बढ़ाया गांव का नाम

इस गांव की कहानी में 8वीं कक्षा की छात्रा दिव्या चौहान भी एक खास नाम बनकर उभरी हैं। दिव्या खेत मजदूर परिवार से आती हैं, लेकिन शतरंज के प्रति उनका जुनून उन्हें लगातार आगे बढ़ा रहा है।

दिव्या दो वर्षों तक तालुका स्तर की प्रतियोगिताओं में अजेय रहीं। इसके बाद उन्होंने स्टेट विमेंस रैपिड चैंपियनशिप में तीसरा स्थान हासिल किया।

अब दिव्या गुजरात के स्पोर्ट्स स्कूल में ट्रेनिंग ले रही हैं। उनका सपना शतरंज में ग्रैंडमास्टर बनकर भारत का प्रतिनिधित्व करना है।

दिव्या का मानना है कि गांव की लड़कियों को भी बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि वे मेहनत के दम पर किसी भी मुकाम को हासिल कर सकती हैं।

गांव की कहानी सामने आने के बाद प्रशासन भी आया आगे

सितंबर 2025 में जब इस छोटे से गांव की शतरंज प्रतिभा की कहानी सामने आई तो प्रशासन का भी ध्यान इस ओर गया। इसके बाद महीसागर प्रशासन ने गांव में नए स्कूल के निर्माण की योजना शुरू की।

प्रस्तावित नया स्कूल मौजूदा भवन से करीब 8.5 गुना बड़ा होगा। इसमें बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं के साथ विशेष शतरंज हॉल भी तैयार करने की योजना है।

यानी जिस गांव में कुछ साल पहले बच्चों के पास सीमित संसाधन थे, वहां अब शतरंज के लिए अलग सुविधाएं विकसित करने की तैयारी हो रही है।

सिर्फ शतरंज नहीं, बदल रही है गांव की सोच

रतुसिंह ना मुवाडा की कहानी इसलिए खास है क्योंकि यहां शतरंज सिर्फ एक खेल नहीं रह गया है। इसने बच्चों में अनुशासन, प्रतियोगिता की भावना और बड़े लक्ष्य हासिल करने का आत्मविश्वास पैदा किया है।

एक शिक्षक की पहल से शुरू हुआ यह सफर अब 17 FIDE-रेटेड खिलाड़ियों तक पहुंच चुका है। गांव के बच्चों की उपलब्धियां यह भी दिखाती हैं कि प्रतिभा के लिए बड़े शहर, महंगी अकादमी या संपन्न परिवार जरूरी नहीं हैं। जरूरत है तो सिर्फ सही मार्गदर्शन, अवसर और लगातार मेहनत की।

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