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भीड़तंत्र से हारना प्रजातंत्र: लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल

By yogesh jindoria | Published: Sep 18, 2026 01:41 PM

भीड़तंत्र से हारना प्रजातंत्र

अनिल भारद्वाज

जंतर-मंतर के संसद मार्च का निष्कर्ष यह निकला कि अगर आप 25,000-30,000 की भीड़ जुटा लेते हैं तो आप सरकार से कुछ भी मनवा सकते हैं। हिंसक प्रदर्शनकारियों की एफआईआर रद्द की जा सकती है। प्रदर्शन में पैलेट गन के शिकार प्रदर्शनकारी की एफआईआर नहीं लिखी जा रही थी। नेता प्रतिपक्ष और भीड़ जुटी तो एफआईआर लिखी गई।

प्रदर्शन में दो व्यक्तियों की लड़ाई हो गई। जब भीड़ ज्यादा हो गई तो एफआईआर में धाराएं बढ़ाई गईं। योगेंद्र यादव ने कहा कि सड़क से चलेंगे। मॉब हिंसा मामले में देश अब संविधान से नहीं, सड़क से चलेगा। मॉब हिंसा के मामले में न्यायालय का निर्णय भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगता है।

देश में दंगाइयों के सामने सरकार और अदालतों में मुकाबला चल रहा है कि कौन उन्हें ज्यादा राहत दे सकता है। यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंतित करने वाली है। सवाल यह है कि जब भीड़ वाहनों को नुकसान पहुंचा रही हो, पुलिस जवानों को पीट रही हो और सरकारी भवनों में तोड़फोड़ कर रही हो, तो क्या पुलिस मूकदर्शक बनकर खड़ी रह सकती है?

पुलिस का पहला कर्तव्य मानव जीवन, सार्वजनिक संपत्ति, निजी संपत्ति तथा हिंसा को रोकना है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और हिंसा की स्थिति में कार्रवाई करना उसके कर्तव्यों का हिस्सा है।

सरकार व न्यायालयों के विपरीत रुख के चलते पुलिस प्रशासन को महसूस होने लगे कि हिंसा के खिलाफ कार्रवाई करने पर उन पर ही कार्रवाई भारी पड़ सकती है, इससे कानून तोड़ने वालों को प्रोत्साहन मिलेगा। अधिकारी निर्णय लेने से डरेंगे और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी बात रखने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन भीड़ के दबाव में कानून-व्यवस्था के सिद्धांत कमजोर नहीं होने चाहिए। यदि हिंसा और भीड़ के दबाव को निर्णयों को प्रभावित करने का माध्यम माना जाने लगे, तो इसका असर शासन व्यवस्था और कानून के निष्पक्ष पालन पर पड़ सकता है।

अंततः राज्य ही कमजोर दिखेगा।

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