अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट ने दो साल की एक बच्ची की मौत से जुड़े बेहद संवेदनशील मामले में उसकी मां को जमानत दे दी है। महिला पर आरोप था कि उसने अपनी बेटी को खाना मांगने पर पीटा था, जिसके बाद बच्ची की मौत हो गई। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने घटना को बेहद दुखद और दिल दहला देने वाला बताया।
हालांकि, जमानत देते हुए कोर्ट ने इस पूरे मामले को केवल एक आपराधिक घटना के तौर पर नहीं देखा, बल्कि भुखमरी, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से जुड़े व्यापक सवालों पर भी टिप्पणी की।
जस्टिस हसमुख डी. सुथार की अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भुखमरी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह इंसान की गरिमा, न्याय और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा है।
मार्च 2026 में हुई थी महिला की गिरफ्तारी
मामले में आरोपी महिला की पहचान लखीबेन सोलंकी के रूप में हुई है। वह तीन बच्चों की मां है। उसे मार्च 2026 में अपनी दो साल की बेटी की मौत के मामले में गिरफ्तार किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, बच्ची ने खाना मांगा था। आरोप है कि इस बात से नाराज होकर महिला ने उसकी पिटाई की। बाद में बच्ची की मौत हो गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू की गई थी। इसके बाद उसने गुजरात हाई कोर्ट में जमानत के लिए याचिका दाखिल की।
हाई कोर्ट ने जमानत देते हुए भुखमरी पर की गंभीर टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने घटना की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही भुखमरी के सामाजिक प्रभाव पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि जब भूख और अभाव किसी मां को इस तरह के कदम उठाने की स्थिति तक पहुंचा देते हैं, तो इसे केवल किसी एक व्यक्ति की विफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अदालत के मुताबिक, यह समाज के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या किसी मां या बच्चे को बुनियादी जरूरतों के लिए इस तरह संघर्ष करना पड़ना चाहिए।
कोर्ट ने सामाजिक न्याय की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य सेवा और सम्मान के साथ जीवन जीने जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा- किसी बच्चे को भूख का सामना न करना पड़े
अदालत ने इस दुखद घटना को भविष्य के लिए एक संकल्प के रूप में देखने की बात कही। कोर्ट का जोर इस बात पर था कि समाज और व्यवस्था ऐसी स्थिति पैदा होने से रोकने के लिए काम करे, जहां किसी बच्चे को भोजन जैसी बुनियादी जरूरत के लिए संघर्ष करना पड़े।
अदालत की टिप्पणी ने इस मामले को सिर्फ आरोपी मां की कानूनी जिम्मेदारी तक सीमित रखने के बजाय भूख और गरीबी से जुड़े व्यापक सामाजिक मुद्दे से जोड़ दिया।
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज के कमजोर वर्गों को भी सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए आवश्यक सुविधाएं मिलें।
‘मानवीनी भवाई’ का भी कोर्ट ने किया जिक्र
अपने आदेश में गुजरात हाई कोर्ट ने प्रसिद्ध गुजराती लेखक पन्नालाल पटेल के उपन्यास ‘मानवीनी भवाई’ का भी उल्लेख किया।
इस साहित्यिक कृति में अत्यधिक भूख, गरीबी और सामाजिक संकट के बीच इंसानी जिंदगी पर पड़ने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभावों को चित्रित किया गया है।
कोर्ट के संदर्भ में इसका उल्लेख यह बताने के लिए किया गया कि भूख केवल पेट की समस्या नहीं है। लंबे समय तक रहने वाला अभाव इंसान के मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
जमानत का मतलब आरोप से बरी होना नहीं
गुजरात हाई कोर्ट ने महिला की जमानत याचिका स्वीकार की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने महिला को आरोपों से बरी कर दिया है या मामले में उसे निर्दोष घोषित कर दिया है।
जमानत आपराधिक न्याय प्रक्रिया का एक हिस्सा है, जबकि मामले की सुनवाई और आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति अलग प्रक्रिया के तहत तय होती है।
इस मामले में भी महिला के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम फैसला आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होना है।
मामले ने उठाए कई बड़े सवाल
दो साल की बच्ची की मौत से जुड़े इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक ओर आरोप है कि बच्ची को खाना मांगने पर पीटा गया, वहीं दूसरी ओर अदालत ने भुखमरी और सामाजिक सुरक्षा के सवाल को प्रमुखता से सामने रखा है।
कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि समाज में किसी भी बच्चे को भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित नहीं होना चाहिए।
यह मामला अब केवल एक परिवार की त्रासदी तक सीमित नहीं रह गया है। अदालत की टिप्पणियों ने भूख, गरीबी, सामाजिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा के बीच संबंध पर भी चर्चा को सामने ला दिया है।