गुजरात: के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के नीचे कथित रूप से बौद्ध गुफा और प्राचीन अवशेष होने के दावे को लेकर दायर पुनर्याचिका पर गुजरात हाई कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बिना ठोस और प्रमाणित दस्तावेजों के ऐसे संवेदनशील एवं ऐतिहासिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
यह मामला पहले भी अदालत के समक्ष आ चुका था। जून 2026 में हाई कोर्ट ने इसी विषय पर दायर एक याचिका को खारिज करते हुए उसे भ्रामक और प्रचार पाने की कोशिश बताया था तथा याचिकाकर्ता पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इसके बाद इस मामले में पुनर्याचिका दाखिल की गई थी।
क्या था याचिकाकर्ता का दावा?
पुनर्याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कांग्रेस नेता रत्ना वोरा ने अदालत के समक्ष दावा किया कि वर्ष 2017 में IIT गांधीनगर द्वारा किए गए एक सर्वे में सोमनाथ मंदिर के नीचे बौद्ध गुफाओं और अवशेषों के संकेत मिलने की बात सामने आई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इस कथित सर्वे के आधार पर मामले की विस्तृत जांच कराई जानी चाहिए ताकि ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाया जा सके।
हालांकि, अदालत ने इस दावे के समर्थन में ठोस दस्तावेज और आधिकारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा।
कोर्ट ने मांगे ठोस साक्ष्य
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल मीडिया रिपोर्टों या अपुष्ट दावों के आधार पर किसी संवेदनशील विषय में न्यायिक आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
जब अदालत ने सर्वे रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा, तब याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत रिपोर्ट मांगी गई थी, लेकिन इसे सोमनाथ ट्रस्ट की संपत्ति बताते हुए उपलब्ध नहीं कराया गया।
अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर कोई प्रमाणित दस्तावेज मौजूद नहीं है, तो केवल अनुमान या सार्वजनिक चर्चाओं के आधार पर मामले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।
‘संवेदनशील और काल्पनिक मुद्दों पर हस्तक्षेप नहीं’
खंडपीठ ने अपने अवलोकन में कहा कि न्यायालय को केवल विश्वसनीय और प्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर ही किसी मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त आधार के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले मामलों को न्यायिक प्रक्रिया में लाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
पहले भी खारिज हो चुकी थी याचिका
इससे पहले डॉ. विलास तुकाराम खरात द्वारा इसी विषय पर दायर याचिका को जून 2026 में गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
उस समय अदालत ने याचिका को भ्रामक बताते हुए याचिकाकर्ता पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस प्रकार की याचिकाएं बिना पर्याप्त साक्ष्य के न्यायालय का समय व्यर्थ करती हैं।
बाद में उसी मामले में पुनर्विचार के लिए यह नई याचिका दाखिल की गई थी।
राज्य सरकार ने भी किया विरोध
सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार की ओर से भी इस पुनर्याचिका का विरोध किया गया। सरकार का पक्ष था कि याचिका के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं है और यह मामला प्रचार हासिल करने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है।
सरकार ने अदालत से याचिका को खारिज करने का आग्रह किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता का पक्ष रखने की मांग भी अस्वीकार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता तथा मुंबई हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश उनके पक्ष को आगे रखेंगे।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के पेश होने की संभावना के आधार पर मामले की सुनवाई को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
मामले का महत्व
सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों में से एक है और उससे जुड़े किसी भी ऐतिहासिक या पुरातात्विक दावे को लेकर सार्वजनिक रुचि स्वाभाविक रहती है। हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में निष्कर्ष केवल प्रमाणित वैज्ञानिक और आधिकारिक साक्ष्यों के आधार पर ही निकाले जा सकते हैं।