कमजोर मॉनसून से बढ़ी चिंता: भारत में 12.6 फीसदी कम बारिश, महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा
नई दिल्ली/मुंबई: साल 2026 का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून देश के लिए कमजोर और असमान रहा। जून से सितंबर के बीच भारत में सामान्य से 12.6 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान देश में 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 868.6 मिलीमीटर मानी जाती है। यह साल 2001 के बाद सबसे कम मानसूनी बारिश वाले वर्षों में चौथे स्थान पर रहा।
कमजोर मॉनसून का असर सिर्फ बारिश के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा। बारिश के समय और उसके क्षेत्रीय वितरण में काफी अंतर रहा। कई इलाकों में लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रही, जबकि कुछ क्षेत्रों में कम समय में भारी बारिश हुई। इसका असर खेती, जल स्रोतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है।

जून में ही कमजोर रही बारिश
इस साल मॉनसून की शुरुआत कमजोर रही। जून के दौरान देश में सामान्य से करीब 35 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। इसके बाद जुलाई में बारिश की स्थिति कुछ बेहतर हुई और देश में सामान्य से लगभग 1 फीसदी अधिक बारिश हुई। इससे शुरुआती कमी कुछ हद तक कम हुई, लेकिन मानसून की यह सुधार की स्थिति ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी।
जुलाई के बाद अगस्त और सितंबर में कई क्षेत्रों में फिर बारिश की कमी देखने को मिली। IMD के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक जुलाई के मध्य तक बारिश की कमी काफी बढ़ गई थी। बाद में जुलाई के आखिर और अगस्त की शुरुआत में बारिश बढ़ी, लेकिन अगस्त के मध्य के बाद फिर कमी की स्थिति बनी।
बारिश का असमान वितरण बना बड़ी समस्या
2026 के मॉनसून की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक बारिश का असमान वितरण रहा। देश का राष्ट्रीय औसत भले ही 12.6 फीसदी की कमी दिखाता है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिति काफी अलग रही।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश सामान्य से करीब 25 फीसदी कम रही, जबकि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में करीब 24 फीसदी की कमी दर्ज की गई। उत्तर-पश्चिम भारत में कमी लगभग 6 फीसदी रही, जबकि मध्य भारत में बारिश सामान्य के आसपास रही और करीब 2 फीसदी की कमी दर्ज की गई।
कुछ राज्यों और क्षेत्रों में कमी और ज्यादा गंभीर रही। अरुणाचल प्रदेश में बारिश सामान्य से करीब 44 फीसदी, असम और मेघालय में 39 फीसदी और बिहार में 32 फीसदी कम रही। पंजाब में भी करीब 41 फीसदी की कमी दर्ज की गई। मराठवाड़ा में बारिश की कमी करीब 39 फीसदी रही।
महाराष्ट्र में सूखे जैसे हालात
कम बारिश का सबसे गंभीर असर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में देखने को मिला। राज्य में बारिश का वितरण बेहद असमान रहा। खासतौर पर मराठवाड़ा और विदर्भ के कई इलाकों में लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रही।
महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर 2026 को राज्य के 358 में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया। यह राज्य के करीब तीन-चौथाई तालुकों के बराबर है। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में फसल नुकसान का आकलन और राहत से जुड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में इस साल बारिश की कमी करीब 18 फीसदी रही, लेकिन राज्य के भीतर क्षेत्रीय अंतर काफी बड़ा था। मराठवाड़ा में सामान्य से करीब 38 फीसदी कम और विदर्भ में करीब 27 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। लातूर, बीड और सोलापुर जैसे कुछ इलाकों में बारिश सामान्य के लगभग आधे स्तर तक रही।
सोयाबीन और दूसरी फसलों पर असर
बारिश की कमी का सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ा है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में सोयाबीन, अरहर और ज्वार जैसी फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं।
कम बारिश और लंबे सूखे दौर के कारण कई किसानों के लिए फसल की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया। कुछ क्षेत्रों में किसानों को खेतों में खराब हुई फसल हटाने के लिए भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। फसल उत्पादन में कमी की आशंका से कृषि आधारित आय और ग्रामीण बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मराठवाड़ा में सोयाबीन का उत्पादन सामान्य स्तर के करीब 40-50 फीसदी तक रहने का अनुमान बताया गया है, जबकि विदर्भ में यह 60-70 फीसदी के आसपास रह सकता है। हालांकि क्षेत्र और फसल के अनुसार स्थिति अलग-अलग है।
जलाशयों में भी घटा पानी
कम बारिश का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। जलाशयों और अन्य जल स्रोतों में भी पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
सितंबर के अंत तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण क्षमता के मुकाबले पानी का स्तर करीब 70 फीसदी के आसपास बताया गया। यह पिछले वर्ष और दीर्घकालिक औसत की तुलना में कम है। दक्षिण भारत के जलाशयों में स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय बनी हुई है।
जलाशयों में पानी की कमी का असर सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। जिन इलाकों में खेती और ग्रामीण पेयजल व्यवस्था जलाशयों पर निर्भर है, वहां आने वाले महीनों में पानी का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कमजोर मॉनसून और अल-नीनो का कनेक्शन
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार 2026 में अल-नीनो की स्थिति ने मॉनसून के प्रदर्शन को प्रभावित किया। अल-नीनो सामान्य तौर पर भारत में मॉनसून की बारिश को कमजोर करने वाली परिस्थितियों से जुड़ा रहा है, हालांकि किसी एक साल में बारिश पर सिर्फ अल-नीनो के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। समुद्री तापमान और अन्य वायुमंडलीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस साल मॉनसून की कमजोरी और क्षेत्रीय असमानता ने इस प्रभाव को कई इलाकों में ज्यादा स्पष्ट किया। IMD के आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में मौसमी बारिश 12.6 फीसदी कम रही।
आगे पानी और खेती के सामने चुनौती
मॉनसून खत्म होने के बाद अब किसानों और सरकारों की नजर रबी सीजन पर है। मिट्टी में नमी की कमी और जलाशयों में कम पानी का असर रबी की बुवाई पर पड़ सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं।
महाराष्ट्र में सरकार द्वारा 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किए जाने के बाद फसल नुकसान का आकलन और राहत उपाय महत्वपूर्ण होंगे। वहीं देश के अन्य हिस्सों में भी कम बारिश वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण और सिंचाई प्रबंधन पर दबाव बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर 2026 का कमजोर मॉनसून केवल बारिश की कमी की कहानी नहीं है। बारिश कब हुई, कितनी हुई और किस क्षेत्र में हुई—इन सभी कारकों ने खेती और जल संसाधनों की स्थिति को प्रभावित किया है। अब आने वाले महीनों में जलाशयों का स्तर, रबी की बुवाई और सर्दियों में होने वाली बारिश यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि कमजोर मॉनसून का असर कितना लंबा चलता है।