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Kedarnath vs Nepal Flood: कैसे अलग थीं दोनों हिमालयी आपदाएं? जानें बाढ़ के पीछे का वैज्ञानिक कारण

Kedarnath vs Nepal Flood: कैसे अलग थीं दोनों हिमालयी आपदाएं? जानिए बाढ़ के पीछे का वैज्ञानिक कारण

नई दिल्ली: हिमालय में आने वाली बाढ़ को केवल भारी बारिश का नतीजा मानना सही नहीं है। पहाड़ी इलाकों में बारिश के साथ ग्लेशियल झील का टूटना, ग्लेशियर का पिघलना, भूस्खलन और बर्फ-चट्टानों का अचानक खिसकना भी बड़ी आपदा को जन्म दे सकता है। 2013 की केदारनाथ आपदा और 2026 में नेपाल में आई भीषण बाढ़ इसी जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया की अलग-अलग तस्वीर पेश करती हैं।

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नेपाल में 1 सितंबर 2026 तक 987 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 3,916 लोग अब भी लापता बताए गए हैं। राहत और बचाव अभियान के दौरान 11,814 लोगों को बचाया जा चुका है और करीब 93,000 लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक नजरिए से यह समझना जरूरी हो जाता है कि हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदाएं आखिर किस तरह आकार लेती हैं और केदारनाथ तथा नेपाल की घटनाओं में क्या समानता और अंतर था।

2013 में केदारनाथ में क्या हुआ था?

जून 2013 में उत्तराखंड में लगातार भारी बारिश ने हालात बेहद खराब कर दिए थे। केदारनाथ के ऊपर चोराबारी ग्लेशियर के पास चोराबारी ताल नाम की एक ग्लेशियल झील मौजूद थी। लगातार बारिश और बर्फ पिघलने के कारण झील में पानी का स्तर तेजी से बढ़ गया।

झील को रोकने वाली प्राकृतिक संरचना पर पानी का दबाव बढ़ता गया और आखिरकार 16-17 जून की रात झील टूट गई। इसके बाद बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहा।

यह पानी अपने साथ पत्थर, मिट्टी और भारी मात्रा में मलबा लेकर आया। इससे मंदाकिनी नदी का बहाव अचानक बेहद तेज हो गया। पानी और मलबे के इस तेज प्रवाह ने केदारनाथ और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई।

हालांकि 2013 की आपदा को केवल केदारनाथ तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उत्तराखंड के सभी 13 जिले प्रभावित हुए थे। करीब 4,200 गांव और 9 लाख से ज्यादा लोग इस आपदा की चपेट में आए। बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हो गए।

बाढ़ और मलबे के कारण सड़कें और पुल टूट गए। कई घरों और इमारतों को नुकसान पहुंचा। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित हुए। कई लोग सुरंगों और दुर्गम इलाकों में फंस गए थे, जिससे राहत और बचाव अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया था।

2026 में नेपाल में क्या हुआ?

नेपाल में 2026 की आपदा का स्वरूप भी बेहद गंभीर रहा। लगातार बारिश के बीच हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झील और भूस्खलन जैसी घटनाओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया।

बताया गया कि अगस्त 2026 के अंत में नेपाल के खालंग-साबा क्षेत्र में स्थित एक ग्लेशियल झील के टूटने की घटना सामने आई। इसके साथ ही पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा भूस्खलन (Landslide) के रूप में नीचे आया।

बर्फ और चट्टानों का यह विशाल हिस्सा तेजी से नीचे की ओर आया और नदी के बहाव को प्रभावित किया। इसके बाद पानी, पत्थर, बर्फ और मिट्टी का तेज प्रवाह निचले इलाकों की ओर बढ़ गया।

इसका असर त्रिशूली, बागमती और अन्य नदियों के जलस्तर पर भी पड़ा। अचानक जलस्तर बढ़ने से कई गांव और शहर बाढ़ की चपेट में आ गए और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ।

Kedarnath vs Nepal Flood में क्या था अंतर?

Kedarnath vs Nepal Flood की तुलना करने पर दोनों घटनाओं में कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन दोनों का ट्रिगर पूरी तरह एक जैसा नहीं था।

2013 की केदारनाथ आपदा में लगातार भारी बारिश और चोराबारी झील के टूटने ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झील से निकले पानी के साथ बड़ी मात्रा में मलबा नीचे आया और मंदाकिनी नदी का बहाव अचानक बेहद तेज हो गया।

वहीं 2026 की नेपाल आपदा में ग्लेशियल झील टूटने के साथ बड़े भूस्खलन और बर्फ-चट्टानों के नीचे आने जैसी घटनाओं ने स्थिति को और गंभीर बनाया। यानी यहां पानी के साथ पहाड़ से आया भारी मलबा और चट्टानी सामग्री भी आपदा की तीव्रता बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रही।

सरल शब्दों में कहा जाए तो दोनों घटनाओं में पानी और मलबे का तेज बहाव विनाश का बड़ा कारण बना, लेकिन आपदा को जन्म देने वाली परिस्थितियों और घटनाओं की श्रृंखला अलग थी।

हिमालय में ग्लेशियल झील क्यों बन रही हैं?

हिमालय में बड़ी संख्या में ग्लेशियर मौजूद हैं। जब तापमान बढ़ता है और ग्लेशियर तेजी से पीछे हटते हैं, तो उनके आसपास या सामने पानी जमा होकर ग्लेशियल झील बना सकता है।

इन झीलों को कई बार बर्फ, मलबे या प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं। यदि पानी का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाए या कोई भूस्खलन, बर्फ का बड़ा हिस्सा या चट्टान झील में गिर जाए, तो प्राकृतिक बांध टूट सकता है।

इसे Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है। ऐसी बाढ़ बेहद तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकती है और अपने साथ पत्थर, बर्फ, मिट्टी और मलबा भी ले जा सकती है।

क्या क्लाइमेट चेंज भी है वजह?

हिमालय में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया से कुछ स्थानों पर नई या बड़ी ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं।

इसके अलावा तापमान में बदलाव से ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और जमीन की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है। इससे भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।

हालांकि किसी एक बाढ़ या आपदा को केवल Climate Change का परिणाम बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। ऐसी घटनाओं में भारी बारिश, भूगर्भीय परिस्थितियां, ग्लेशियरों की स्थिति, झीलों का आकार और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां कई कारकों के रूप में एक साथ काम करती हैं।

हिमालयी आपदाओं से क्या सीख मिलती है?

केदारनाथ और नेपाल की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को केवल बारिश की निगरानी तक सीमित नहीं रखा जा सकता। ग्लेशियल झीलों, ग्लेशियरों, पहाड़ी ढलानों और नदियों की लगातार निगरानी भी जरूरी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक संवेदनशील क्षेत्रों में Early Warning System, सैटेलाइट निगरानी, नदी के जलस्तर की रियल टाइम मॉनिटरिंग और ग्लेशियल झीलों की नियमित जांच से खतरे को पहले पहचानने में मदद मिल सकती है।

इसके साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, पुल, इमारत और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बनाते समय स्थानीय भूगोल और प्राकृतिक जोखिमों को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

Kedarnath vs Nepal Flood की तुलना बताती है कि हिमालयी बाढ़ एक बहुस्तरीय प्राकृतिक आपदा हो सकती है। कहीं भारी बारिश और ग्लेशियल झील का टूटना मुख्य भूमिका निभाता है, तो कहीं इसके साथ भूस्खलन, बर्फ और चट्टानों का तेज बहाव तबाही को कई गुना बढ़ा देता है।

2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2026 की नेपाल आपदा दोनों ही इस बात की चेतावनी हैं कि बदलते हिमालयी पर्यावरण के बीच आपदा की निगरानी और पूर्व चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। समय रहते खतरे की पहचान, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्थानीय स्तर पर तैयार आपदा प्रबंधन प्रणाली भविष्य में जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती है।

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