प्रयागराज में दशहरे से पहले रावण की पूजा, चांदी के सिंहासन पर निकली शाही सवारी, जानें अनोखी परंपरा
प्रयागराज: देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के तौर पर किया जाता है, लेकिन संगम नगरी प्रयागराज में दशहरा उत्सव की शुरुआत एक अनोखी परंपरा से होती है। यहां रावण की पूजा-अर्चना और भव्य शोभायात्रा के साथ दशहरा उत्सव का आगाज होता है। श्री कटरा रामलीला कमेटी की ओर से इस साल भी दशानन की शाही सवारी निकाली गई।
पितृ पक्ष की एकादशी पर मुनि भारद्वाज आश्रम स्थित शिव मंदिर में रावण की विधि-विधान से पूजा और आरती की जाती है। इसके बाद रावण को परिवार और मायावी सेना के साथ शोभायात्रा में शहर के प्रमुख मार्गों से ले जाया जाता है। इस दौरान जगह-जगह लोगों की भीड़ जुटती है और शोभायात्रा का स्वागत किया जाता है।
विद्वान स्वरूप के कारण होती है रावण की पूजा
प्रयागराज के कटरा इलाके में रावण को सिर्फ रामायण के खलनायक के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उनके विद्वान और महापंडित स्वरूप को सम्मान दिया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार रावण महर्षि भारद्वाज के नाती माने जाते हैं। इसी वजह से उन्हें यहां विशेष सम्मान दिया जाता है।
मान्यता है कि रावण को वेद-शास्त्रों का गहरा ज्ञान था और वह महान तपस्वी तथा विद्वान थे। यही वजह है कि श्री कटरा रामलीला कमेटी की परंपरा में रामलीला शुरू होने से पहले रावण का पूजन किया जाता है।
पूजा के बाद निकली दशानन की शाही सवारी
इस साल भी मुनि भारद्वाज आश्रम में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रावण का पूजन किया गया। इसके बाद दशानन को चांदी की चौकी पर विराजमान कराया गया, जबकि उनकी पत्नी मंदोदरी और परिवार के अन्य सदस्यों के पात्रों को भी शोभायात्रा में शामिल किया गया।
शोभायात्रा के दौरान ढोल-ताशे, बैंड और आकर्षक लाइट्स ने लोगों का ध्यान खींचा। अलग-अलग स्थानों पर लोगों ने रावण की शाही सवारी का स्वागत किया। आधुनिक दौर में शोभायात्रा में डीजे, लाइटिंग और अन्य आकर्षण भी जुड़ गए हैं, लेकिन इसकी मूल धार्मिक परंपरा अब भी कायम है।
पहले हाथी पर निकलती थी रावण की सवारी
रावण की इस शोभायात्रा का स्वरूप समय के साथ बदला है। पहले दशानन को हाथी पर रखे विशाल चांदी के हौदे में बैठाकर शोभायात्रा निकाली जाती थी। समय के साथ बदलाव आया और अब रावण की सवारी रथ या चांदी की चौकी पर निकाली जाती है।
यात्रा में रावण के साथ उनकी पत्नी मंदोदरी और परिवार के अन्य पात्र भी शामिल होते हैं। इससे शोभायात्रा को रामायण के पात्रों और लंका के राजपरिवार की झांकी का स्वरूप मिलता है।
कटरा में नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
प्रयागराज की इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि कटरा क्षेत्र में श्री कटरा रामलीला कमेटी रावण का पुतला नहीं जलाती। यहां रावण की पूजा के बाद उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है और उन्हें सम्मान दिया जाता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे प्रयागराज में रावण दहन नहीं होता। कटरा की परंपरा में रावण का पुतला बाद में दारागंज रामलीला कमेटी को सौंप दिया जाता है, जहां विजयादशमी के दिन उसका दहन किया जाता है।
परिवार के साथ शोभायात्रा देखने पहुंचते हैं लोग
रावण की शोभायात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान बैंड-बाजे और धार्मिक उद्घोष से माहौल उत्सवमय हो जाता है। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूसरे क्षेत्रों से आने वाले लोग भी आकर्षित होते हैं।
प्रयागराज प्रशासन के अनुसार भी शहर की दशहरा परंपरा अपनी विशेष चौकियों और रामलीला आयोजनों के लिए जानी जाती है। कटरा सहित शहर के कई इलाकों में दशहरे के दौरान सजावटी झांकियां और शोभायात्राएं निकलती हैं।
इस तरह जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा रावण दहन से जुड़ा है, वहीं प्रयागराज का कटरा क्षेत्र रावण के विद्वान स्वरूप के सम्मान और उनकी पूजा के कारण अलग पहचान रखता है। यहां पहले दशानन की पूजा होती है, फिर उनकी भव्य शोभायात्रा निकलती है और बाद में पुतला दहन की परंपरा दूसरे रामलीला आयोजन में पूरी की जाती है।