नई दिल्ली: देश की राजनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। 2027 में उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा समेत सात राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इन चुनावों में 18 से 29 वर्ष की उम्र वाले Gen-Z मतदाता राजनीतिक दलों के लिए अहम साबित हो सकते हैं।
इन सात राज्यों में युवा मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22% बताई जा रही है। ऐसे में अगर इस वर्ग के वोट में थोड़ा भी बड़ा बदलाव आता है तो कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
इसी संभावना ने भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत कई राजनीतिक दलों को युवाओं के बीच अपनी पहुंच और संवाद बढ़ाने पर मजबूर किया है।
257 सीटों पर 5% या उससे कम रहा जीत का अंतर
युवा वोटरों की संभावित भूमिका को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। चुनाव वाले सात राज्यों की कुल 940 विधानसभा सीटों में से 257 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 5% या उससे कम रहा।
उत्तर प्रदेश में 403 में से 131 सीटों पर जीत का अंतर 5% से कम था। गुजरात की 182 सीटों में 27, पंजाब की 117 में 24, उत्तराखंड की 70 में 15 और हिमाचल प्रदेश की 68 में 14 सीटों पर भी मुकाबला बेहद करीबी रहा।
यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषण में यह संभावना जताई जा रही है कि अगर युवा मतदाताओं के एक हिस्से का रुझान किसी एक पार्टी की ओर मजबूत होता है, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि, केवल युवा वोट के आधार पर चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। जातीय समीकरण, महिला मतदाता, ग्रामीण-शहरी मुद्दे, स्थानीय उम्मीदवार और सरकार के कामकाज जैसे कई दूसरे कारक भी चुनावी परिणाम तय करते हैं।
रोजगार और शिक्षा बन सकते हैं सबसे बड़े मुद्दे
Gen-Z के बीच रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, स्किल डेवलपमेंट और डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने केवल घोषणाएं करने के बजाय रोजगार और कौशल विकास को लेकर ठोस योजनाएं पेश करने की चुनौती होगी।
युवाओं की राजनीति में बढ़ती सक्रियता से घोषणापत्रों में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक दलों को यह बताना होगा कि वे रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाएंगे और शिक्षा एवं स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में क्या बदलाव करेंगे।

जाति-धर्म के पुराने समीकरणों को चुनौती?
युवा वोटरों को लेकर एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या Gen-Z जाति और धर्म आधारित पारंपरिक चुनावी समीकरणों को कमजोर कर सकता है।
विश्लेषकों के मुताबिक जाति और क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, लेकिन युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जुड़े मुद्दे अधिक प्रभावी हुए तो राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन और प्रतिनिधित्व में भी बदलाव करना पड़ सकता है।
युवा और सेल्फ-मेड चेहरों को अधिक राजनीतिक अवसर देने की रणनीति भी पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
मुफ्त योजनाओं के बजाय समाधान की मांग?
युवा मतदाताओं को लेकर एक और धारणा यह है कि वे केवल मुफ्त योजनाओं या आर्थिक सहायता के बजाय रोजगार और भविष्य से जुड़े स्थायी समाधान को प्राथमिकता दे सकते हैं।
अगर यह रुझान मजबूत होता है तो राजनीतिक दलों को लोकलुभावन वादों के साथ-साथ व्यावहारिक और लागू किए जा सकने वाले वादों पर भी जोर देना पड़ेगा।
भाजपा से कांग्रेस और सपा तक, युवाओं पर फोकस
Gen-Z को लेकर राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों की गतिविधियां भी बढ़ रही हैं।
भाजपा की ओर से युवाओं से जुड़े मुद्दों पर संगठनात्मक स्तर पर संवाद बढ़ाने की बात सामने आई है। रोजगार और युवा मुद्दों पर चर्चा के साथ सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भी Gen-Z और Gen-Alpha के साथ संवाद कार्यक्रम किए जा रहे हैं। छात्र संगठन ABVP ने भी अपनी सदस्यता और कैंपस पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम शुरू किया है।
कांग्रेस भी युवा आंदोलनों और छात्र मुद्दों को लेकर सक्रिय है। युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रम, डिजिटल कंटेंट और कानूनी सहायता नेटवर्क के जरिए संपर्क बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है।
समाजवादी पार्टी ने भी युवाओं और छात्रों के बीच संवाद बढ़ाने के लिए अपनी रणनीति तैयार की है। पार्टी की छात्र और युवा इकाइयों के जरिए कैंपस स्तर तक पहुंच बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
2027 में कितना असर डालेगा Gen-Z?
अभी विधानसभा चुनावों में कई महीने बाकी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौजूदा युवा सेंटिमेंट चुनाव तक कायम रहेगा या समय के साथ इसके मुद्दे और प्राथमिकताएं बदल जाएंगी।
अगर रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे चुनाव तक प्रमुख बने रहे और Gen-Z मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा किसी खास राजनीतिक दिशा में जाता है, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
यही कारण है कि 2027 के चुनावों से पहले राजनीतिक दल युवा मतदाताओं को केवल वोट बैंक के तौर पर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली चुनावी वर्ग के रूप में देखने लगे हैं।