ज्यादा मेहनत और सक्रियता ही बनी अनिता शर्मा के हटने का कारण

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Faridabad Aone News/ Dinesh Bhardwaj :12 जुलाई। फरीदाबाद की जुझारू और दिन रात पार्टी (भाजपा) के लिये काम करना ही अनिता शर्मा के जिलाध्यक्ष पद से असमय हटने का कारण बना। फरीदाबाद मे इससे पहले महिला मोर्चा को कोई बिरला ही जानता होगा ।नाम मात्र के लिये मोर्चे का गठन किया जाता था ऐसे लोगों को रखा जाता था जो अपने आकाओं की हां मे हां मिलाते रहें।मगर अनिता शर्मा ने ना केवल जिले भर मे सशक्त संगठन खडा किया अपितु भाजपा को महिलाओं तक पहुंचाया और हजारों महिला कार्यकर्ताओं को संगठन मे शामिल किया। उन्होंने दिन रात मेहनत की और कार्यकर्ताओं के रोजमर्रा के काम चाहे वो बिजली पानी.राशन कार्ड. विधवा पेंशन .आपसी झगड़े . आदि को मदद करके निपटाने का प्रयास किया।पूर्वजिलाध्यक्षा अनिता की लोकप्रियता का ये आलम था कि उनके निवास स्थान पर अपनी समस्याएं लेकर सुबह से शाम तक सैंकडो कार्यकर्ता और आम लोग पंहुंचने लगे।और वह तन मन धन से उनकी सेवा करने लगी। पूरे फरीदाबाद के सामाजिक संगठनों ने उन्हें बुलाना और सम्मान देना शुरु कर दिया। बस यही बात बीजेपी के स्थानीय आकाओं को शायद नागवार गुजरी और ढके छुपे शब्दों मे उसे औकात मे रहने की सलाह दी गई। बस यहीं   महिला जिलाध्यक्ष जी गच्चा खा गई। आकाओं को उनके बढते रसूख से खतरा महसूस होने लगा  उनके पर काटने के संकेत तो साल भर पहले ही मिलने लगे थे जब उन्हें सरकारी और गैरसरकारी समारोहों से दूर रखने के प्रयास होने लगे । मगर जब इससे भी काम नही बना तो उनके चरित्र हनन का षडयंत्र रचा गया जिसमे हमारे पत्रकार बंधुओं को बलि का बकरा बनाया गया । सोचा तो ये गया था कि इससे डर कर वो घर बैठ जायेगी परन्तु हुआ एकदम विपरीत। अनिता ने सभी दबावों को नकारते हुये आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। आखिर मे पार्टी के उच्च पदस्थ अधिकारियों से दबाव बनवाया गया । मगर अनिता ने इज्ज़त और पद मे से अपनी आबरू को चुना। सच्चाई सामने होते हुये भी पूरा संगठन और समाज मूकदर्शक बना रहा। चेहरे चाल और चरित्र की बात करने वाली पार्टी ने एक उभरती हुई महिला की किसी और के निजी स्वार्थों के लिये बलि ले ली।अब प्रश्न ये उठता है कि नारी की अस्मिता और अधिकारों की ये राजनीतिक पार्टियां किस मुंह से बात करती हैं और महिलाओं के अधिकारों का ढोल पीटने वाला महिला आयोग कंयू मौन है।हो सकता है उनकी भी कोई राजनैतिक मजबूरी हो।

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