राहुल गांधी : ज़रूरी या मजबूरी

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एवन न्यूज़ दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर राहुल गांधी की निर्विरोध ताजपोशी ने एक बार फ़िर यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस फिलहाल गांधिज्म से बाहर निकलने के लिये तैयार नहीं है।

दरअसल, गांधी के बिना कांग्रेस के वजूद की कल्पना फिलहाल करना मुमकिन नहीं. यही वजह है कि कांग्रेस में सोनिया युग का अंत तो हो गया लेकिन गांधी युग एक पीढ़ी और आगे बढ़ गया. कांग्रेस अध्यक्ष के नाम पर सिर्फ चेहरा बदला और कुछ नहीं. कुछ समय पहले तक पार्टी नेतृत्व में बदलाव की आवाज़ उठाने वाले वरिष्ठ नेता भी लापता हो गये.

आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस का सियासी महल गांधी परिवार की बुनियाद का मोहताज हो गया है? यह सवाल हर आम आदमी के जेहन में उठता है और फ़िर खुद ही दफन हो जाता है.

दरअसल, ये गांधी परिवार का गौरवमयी इतिहास ही है जिसने लाख मुश्किलों के बावजूद कांग्रेस की नाव को डूबने नहीं दिया. राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पूरी तरह गर्त में डूबने लगी थी। तब सोनिया गांधी को न चाहते हुए भी कांग्रेस का हाथ थमा दिया गया। नतीजा सबके सामने था. कांग्रेस फ़िर से जी उठी और मोदी सरकार से पहले दस साल राज़ भी किया. ये पहला वक्त नहीं था जब काँग्रेस के लिये गांधी नाम एक मजबूत स्तम्भ बनकर खड़ा हुआ था.

इससे पहले जब कांग्रेस का विघटन हुआ और इंदिरा गांधी ने कांग्रेस आई की कमान सम्भाली तो कांग्रेस में इंदिरा युग की शुरुआत हुई. वहीं इंदिरा से अलग होकर बनाई गई कांग्रेस का नामोनिशान तक मिट गया. पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी यह समझ गये कि कांग्रेस का महल सिर्फ काबिलियत की बुनियाद पर खड़ा नहीं रह सकता. जिस दिन गांधी नाम कांग्रेस से अलग हुआ उस दिन कांग्रेस का वजूद भी शून्य हो जायेगा. यही वजह है कि तमाम वरिष्ठ और काबिल नेताओं की मौजूदगी के बावजूद राहुल गांधी को निर्विरोध रूप से कांग्रेस की कमान दे दी गई.

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